सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि घर संभालने वाली महिला यानी ‘होममेकर’ की भूमिका को केवल घरेलू कामकाज तक सीमित नहीं माना जा सकता। वह परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। इसलिए सड़क दुर्घटना में किसी होममेकर की मृत्यु होने पर उसके परिवार को मिलने वाले मुआवजे की गणना करते समय उसकी घरेलू सेवाओं और देखभाल के नुकसान को एक स्वतंत्र और अलग क्षतिपूर्ति मद (Head of Compensation) के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि होममेकर की घरेलू सेवाओं का न्यूनतम आर्थिक मूल्य 30,000 रुपये प्रति माह माना जाएगा। अदालत ने इस अवधारणा को ‘Loss of Domestic Care’ नाम दिया है। यह फैसला 25 साल पुराने एक मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले में सुनाया गया है। ये फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल ने लिखा है।
क्या है पूरा मामला?
मामला हरियाणा के सिरसा जिले का है। 25 नवंबर, 2001 को एक महिला की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। महिला फतेहाबाद जा रही थी, तभी लापरवाही से वाहन चलाए जाने के कारण हादसा हुआ।मृतका के परिजनों ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT), सिरसा में मुआवजे की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने दिसंबर 2003 में केवल 2.42 लाख रुपये का मुआवजा दिया। इसके खिलाफ परिवार पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। लगभग 20 वर्ष तक मामला लंबित रहने के बाद दिसंबर 2024 में हाईकोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर 8.43 लाख रुपये कर दिया। इसके बावजूद परिवार संतुष्ट नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया था?
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 11 दिसंबर ,2024 को मुआवजा बढ़ाकर 8,43,400 रुपये कर दिया था। साथ ही दावा याचिका दाखिल होने की तारीख से 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि तीन महीने के भीतर भुगतान नहीं दिया गया तो ब्याज दर 9 प्रतिशत और छह महीने से अधिक देरी होने पर 12 प्रतिशत वार्षिक हो जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘होममेकर’ की क्या परिभाषा दी?
अदालत ने कहा कि ‘हाउसवाइफ’ शब्द महिलाओं की भूमिका को सीमित करता है। इसके बजाय ‘होममेकर’ शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, क्योंकि वह केवल खाना बनाने या घर साफ करने तक सीमित नहीं हैं।
फैसले में कहा गया कि होममेकर घरेलू प्रबंधन, बच्चों के पालन-पोषण, बुजुर्गों की देखभाल, भावनात्मक समर्थन, सामाजिक मूल्यों के हस्तांतरण और मानव संसाधन के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अदालत ने कहा कि चार दीवारों वाले मकान को घर बनाने का काम होममेकर करती हैं।
‘होममेकर ही असली नेशन बिल्डर’
पीठ ने कहा कि यह विडंबना है कि कमाने वाले सदस्यों पर निर्भर माने जाने वाली महिला के बिना पूरा परिवार चल ही नहीं सकता। वास्तव में कमाने वाले सदस्य स्वयं होममेकर पर निर्भर होते हैं। अदालत ने कहा कि बच्चों की पहली शिक्षक मां होती है। बच्चों के संस्कार, सामाजिक व्यवहार, अनुशासन, संवेदनशीलता और भविष्य का निर्माण घर में ही होता है। यही कारण है कि होममेकर अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण में योगदान देती है।
फैसले में कहा गया कि सफल व्यवसायी, राजनेता, कलाकार, वकील या रोज कमाने-खाने वाला श्रमिक सभी की सफलता के पीछे किसी न किसी होममेकर या घरेलू महिला का योगदान होता है। इसलिए अब समय आ गया है कि इस “अदृश्य श्रम” को मान्यता दी जाए। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘होममेकर वास्तव में नेशन बिल्डर हैं।’
महिलाओं के अवैतनिक श्रम पर कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि भारत में 15 से 59 वर्ष की महिलाएं प्रतिदिन सात घंटे से अधिक समय अवैतनिक घरेलू कार्यों में लगाती हैं। महिलाएं, पुरुषों की तुलना में लगभग 2.6 गुना अधिक घरेलू और देखभाल संबंधी कार्य करती हैं। अदालत ने यह भी नोट किया कि महिलाओं का यह अवैतनिक श्रम भारत की जीडीपी में अनुमानित 15 से 17 प्रतिशत तक योगदान देता है, लेकिन उसे आर्थिक मान्यता नहीं मिलती।
‘Loss of Domestic Care’ क्या है?
इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब तक मोटर दुर्घटना मामलों में ‘Loss of Consortium’ यानी पति-पत्नी, बच्चों या माता-पिता के भावनात्मक नुकसान की भरपाई की जाती थी, लेकिन होममेकर के आर्थिक योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता था।
इसी कमी को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ‘Loss of Domestic Care’ नाम से नया मुआवजा मद विकसित किया है। इसमें तीन प्रमुख पहलुओं को शामिल किया गया है:
1. घर के सुचारु संचालन में होममेकर का योगदान, जिसमें घरेलू प्रबंधन, भोजन, सफाई, बुजुर्गों की देखभाल, बच्चों की निगरानी आदि शामिल है।
2. बच्चों को मिलने वाले मातृत्व सहयोग का नुकसान, जिसमें बच्चों के व्यक्तित्व, शिक्षा, संस्कार और भावनात्मक विकास में मां की भूमिका होती है।
3. पति और माता-पिता को मिलने वाले सहयोग का नुकसान भी जोड़ा गया है। जिसमें जीवनसाथी, परिवार और रिश्तों को संभालने में होममेकर की भूमिका महत्वपूर्ण होता है।
इन तीनों पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि कम से कम 30,000 रुपये प्रति माह की राशि ‘Loss of Domestic Care’ के रूप में मानी जाएगी। हर तीन साल में इसमें 10 प्रतिशत वृद्धि भी होगी।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कितना मुआवजा तय किया?
मृतक महिला के परिवार की ओर से दावा किया गया था कि वह बुनाई और सिलाई से 3,000 रुपये प्रतिमाह कमाती थी, लेकिन इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं था। मृतका अपने पीछे पति, दो बेटों और एक बेटी को छोड़ गई थीं।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उसे पूर्णकालिक होममेकर मानते हुए 30,000 रुपये मासिक आय निर्धारित की।
मुआवजे की गणना इस प्रकार की गई:
- मासिक आय: 30,000 रुपये
- वार्षिक आय: 3.60 लाख रुपये
- 40% भविष्यगत संभावनाएं (Future Prospects): 1.44 लाख रुपये
- कुल सालाना आय: 5.04 लाख रुपये
- 16 का मल्टीप्लायर लागू
- आश्रितों के आधार पर 1/4 कटौती
- आश्रित हानि: 60.48 लाख रुपये
- चार आश्रितों के लिए कंसोर्टियम: 1.93 लाख रुपये
- लॉस ऑफ एस्टेट: 18,150 रुपये
- अंतिम संस्कार खर्च: 18,150 रुपये
- इस प्रकार कुल मुआवजा 62,77,900 रुपये निर्धारित किया गया। यानी हाईकोर्ट द्वारा दिए गए 8.43 लाख रुपये की तुलना में यह राशि कई गुना अधिक है।
किन कानूनों और धाराओं की व्याख्या हुई?
फैसले में मुख्य रूप से मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की विभिन्न धाराओं की व्याख्या की गई।
धारा 169
यह धारा मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) को सारांश प्रक्रिया (Summary Procedure) अपनाने का अधिकार देती है। अदालत ने कहा कि इसका वास्तविक उद्देश्य त्वरित न्याय है और इसे अक्षरशः लागू किया जाना चाहिए।
धारा 166 और 168 का व्यापक संदर्भ
हालांकि, निर्णय का केंद्र मुआवजे के निर्धारण से जुड़ा है, अदालत ने ‘Just and Fair Compensation’ की अवधारणा को विस्तार देते हुए कहा कि होममेकर के योगदान का वास्तविक मूल्यांकन इन प्रावधानों की संवैधानिक भावना के अनुरूप किया जाना चाहिए।
किन पुराने फैसलों का हवाला दिया गया?
सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें राजेश बनाम राजबीर सिंह, नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी, मैग्मा जनरल इंश्योरेंस बनाम नानू राम, अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, राजेंद्र सिंह बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, लता वाधवा बनाम बिहार राज्य शामिल हैं।
अदालत ने कहा कि इन फैसलों ने होममेकर के योगदान को मान्यता तो दी, लेकिन घरेलू देखभाल को स्वतंत्र मुआवजा मद के रूप में अब पहली बार स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया है।
मोटर दुर्घटना मामलों में देरी पर भी सुप्रीम कोर्ट सख्त
बेंच ने कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में अत्यधिक देरी गंभीर चिंता का विषय है। अदालत के विश्लेषण के अनुसार हाईकोर्टों में ऐसे मामलों की औसत लंबित अवधि लगभग आठ वर्ष और ट्रिब्यूनलों में छह वर्ष है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों से कहा है कि चार वर्ष से अधिक समय से लंबित मामलों की विशेष निगरानी करें और उनकी प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई सुनिश्चित करें।
फैसले का व्यापक असर क्या होगा?
यह फैसला केवल एक मुआवजा विवाद तक सीमित नहीं है। इसका असर देशभर में लंबित और भविष्य में दायर होने वाले हजारों मोटर दुर्घटना मामलों पर पड़ेगा। पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट मानक तय किया है कि होममेकर के घरेलू श्रम को केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि आर्थिक मूल्य के साथ देखा जाएगा। इससे महिलाओं के अवैतनिक घरेलू कार्य को न्यायिक मान्यता मिलेगी।










































