देश पहले, छुट्टी बाद में’ के जज्बे के साथ सागर के वीर सपूत कालीचरण तिवारी कारगिल युद्ध में छुट्टी रद्द कर मोर्चे पर लौट गए थे। दुश्मन की गोलियों से छलनी होने के बावजूद उन्होंने आखिरी सांस तक मुकाबला किया और 27 अक्टूबर 1999 को मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया…सागर: देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस मौके पर उन वीर जवानों की कहानियां फिर याद आती हैं, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। सागर के शहीद सिपाही कालीच28 अगस्त 1976 को सागर में जन्मे कालीचरण को देशसेवा का जज्बा परिवार से मिला था। उनके पिता शिवजन्म तिवारी भी सेना में जवान रहे थे। बचपन से पिता से सेना और देशभक्ति के किस्से सुनते हुए कालीचरण ने भी सेना में जाने का फैसला कर लिया था। हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सेना की भर्ती में हिस्सा लिया और भारतीय सेना की 12वीं राष्ट्रीय राइफल्स में शामिल हो गए।
कारगिल की खबर मिली तो रद्द कराई छुट्टी
साल 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान कालीचरण एक महीने की छुट्टी लेकर सागर आए हुए थे। लेकिन जैसे ही उन्हें युद्ध की गंभीर स्थिति की जानकारी मिली, उनका मन घर पर नहीं लगा। परिजनों के मुताबिक कालीचरण कहते थे-‘मेरी जरूरत सीमा पर है और मैं यहां घर पर पड़ा हूं।’ इसके बाद उन्होंने सागर स्थित महार रेजीमेंट के कार्यालय पहुंचकर अपनी छुट्टी रद्द कराई और देश की रक्षा के लिए वापस मोर्चे की ओर रवाना हो गए।परिजनों के अनुसार, जाते समय उन्होंने परिवार के पैर छुए थे। उन्होंने यह भी कहा था कि शायद अब मुलाकात न हो पाए। उनके इस भावुक अंदाज ने परिवार के मन में उनकी आखिरी याद को हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।
देख लेना, सिविल लाइन में मेरी मूर्ति लगेगी
कालीचरण के परिजनों के मुताबिक, मोर्चे पर रवाना होने से पहले उन्होंने एक बात कही थी, जो आज भी परिवार को याद है। उन्होंने कहा था—’देख लेना, सिविल लाइन में मेरी मूर्ति लगेगी।’ उस वक्त शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह बात इतनी जल्दी सच










































