Guna News: मध्य प्रदेश के गुना जिले में आदिवासियों की पट्टे की जमीनों पर अवैध कब्जा जमाने वाले रसूखदारों के खिलाफ प्रशासन ने बड़ा कानूनी शिकंजा कसा है। हाईकोर्ट की सख्त फटकार और तल्खी के बाद जागे प्रशासनिक अमले ने एक ही दिन में 90 से अधिक दबंगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराई है।गुना: जिले में आदिवासियों की पट्टे की जमीनों पर बरसों से कुंडली मारकर बैठे दबंगों के खिलाफ आखिरकार जिला प्रशासन को कड़ा कानूनी कदम उठाना पड़ा है। हाईकोर्ट की सख्त तल्खी और कड़ी फटकार के बाद जागे प्रशासनिक अमले ने सोमवार को जिले भर में ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए 90 से अधिक रसूखदारों और दबंगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराई हैं। एक ही दिन में रिकॉर्ड स्तर पर हुई इस व्यापक कार्रवाई से कब्जाधारियों में हड़कंप मच गया है।
खुद एसडीएम बनीं फरियादी, बमोरी में सबसे बड़ा एक्शन
इस पूरी कार्रवाई की सबसे खास बात यह रही कि बमोरी और अन्य क्षेत्रों में खुद एसडीएम ने शासन की ओर से फरियादी (शिकायतकर्ता) बनकर पुलिस थानों में आपराधिक प्रकरण दर्ज कराए हैं, जबकि चांचौड़ा क्षेत्र में पीड़ित पट्टाधारकों की ओर से रिपोर्ट दर्ज कराई गई है।जिले के अलग-अलग थानों में सोमवार शाम तक कई आपराधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं। इनमें सबसे बड़ी कार्रवाई बमोरी तहसील में देखने को मिली, जहां बेदखली के आदेश के बावजूद सरकारी जमीन पर कब्जा न छोड़ने वाले 23 दबंगों के खिलाफ एक साथ मामला कायम किया गया। पुलिस के मुताबिक, इन सभी दर्ज प्रकरणों में आगामी 6 महीने के भीतर जांच पूरी कर चालान प्रस्तुत किया जाएगा।
- अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग की कृषि भूमि को लेकर लंबे समय से राजस्व न्यायालयों में प्रकरण लंबित थे।
- एसडीएम और तहसीलदार स्तर से आदिवासियों के पक्ष में फैसला सुनाने के बावजूद दबंगों ने कब्जा नहीं छोड़ा था।
- रसूखदार प्रशासनिक आदेशों को ठेंगा दिखाकर लगातार जमीनों पर बोवनी और खेती कर रहे थे।
हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणी और ऐतिहासिक नजीर
गत 29 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय की युगलपीठ ने प्रशासन की कार्यशैली पर भारी नाराजगी जताई थी। कोर्ट ने कड़े शब्दों में पूछा था कि जब एसडीएम को अवैध कब्जे की पूरी जानकारी थी, तो उन्होंने खुद आगे बढ़कर थानों में एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराई? केवल कागजी पंचनामे बनाकर खानापूर्ति की जा रही थी।हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि जहां भी कब्जा वापसी के आदेश पारित हों, वहां एसडीएम स्वयं अनिवार्य रूप से एफआईआर दर्ज कराएं। इसी दबाव के चलते प्रशासन ने यह ऐतिहासिक कदम उठाया। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क जजमेंट (ए.आर. अंतुले बनाम रामदास श्रीनिवास नायक) की नजीर देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध की जानकारी रखने वाला कोई भी अधिकारी कानून को सक्रिय कर सकता है। राज्य सरकार ने कोर्ट को आश्वस्त किया है कि एसडीएम द्वारा खुद फरियादी बनकर एफआईआर दर्ज कराने का यह नियम अब पूरे मध्य प्रदेश में अनिवार्य रूप से लागू होगा।गंभीर धाराओं में कसा गया शिकंजा
- दबंगों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है:
- बीएनएस धारा 329(3): किसी की भूमि पर आपराधिक नीयत से घुसना अथवा जबरन कब्जा बनाए रखना।
- एसटीएससी एक्ट धारा 3(1)(एफ): अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति की जमीन पर अवैध रूप से कब्जा करना या उस पर खेती करना।
- एसटीएससी एक्ट धारा 3(1)(जी): एससी/एसटी वर्ग के व्यक्ति को उसकी भूमि से बेदखल करना या उसके भू-अधिकारों में अवैध दखल देना।
गुना कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल ने बताया कि सरकार की मंशा है कि पट्टे पर दी गई जमीन पर आदिवासी का ही कब्जा होना चाहिए। कई मामलों में गैर-आदिवासियों को बिना कलेक्टर की अनुमति के बटाई पर जमीन दी गई थी, जिन्हें पहले कब्जा वापस दिलाया गया और अब एफआईआर की कार्रवाई की जा रही है। इस सख्ती से साफ है कि प्रशासन अब आदिवासियों के अधिकारों के प्रति पूरी तरह गंभीर हो गया है।






































