आज के समय में महिलाएं नौकरी, बिजनेस और निवेश के जरिए अपनी खुद की संपत्ति बना रही हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर किसी हिंदू महिला की बिना वसीयत (Will) बनाए मृत्यु हो जाती है तो उसकी संपत्ति का बंटवारा हमेशा उसके माता-पिता के पक्ष में नहीं होता। कुछ परिस्थितियों में उसकी संपत्ति पहले उसके पति के कानूनी वारिसों को मिल सकती है। यह व्यवस्था हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (Hindu Succession Act), 1956 की धारा 15 में दी गई है।
क्या कहता है कानून?
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के अनुसार, अगर कोई हिंदू महिला बिना वसीयत बनाए (Intestate) मृत्यु को प्राप्त होती है, तो उसकी संपत्ति का उत्तराधिकार एक तय क्रम के अनुसार होता है। सबसे पहले उसके बेटे, बेटियां और पति को अधिकार मिलता है। अगर इनमें से कोई भी जीवित नहीं है तो संपत्ति पति के कानूनी वारिसों के पास जाती है। इसके बाद ही महिला के माता-पिता और फिर उनके वारिसों का नंबर आता है। इसका मतलब यह है कि कई मामलों में महिला के अपने माता-पिता से पहले उसके पति के परिवार को संपत्ति मिल सकती है।
कब लागू होता है यह नियम?
मान लीजिए किसी महिला की कोई संतान नहीं है और उसके पति की भी पहले ही मृत्यु हो चुकी है। अगर उसने अपनी स्वयं की कमाई से घर, जमीन या अन्य संपत्ति बनाई है और उसने वसीयत नहीं लिखी है, तो ऐसी स्थिति में उसकी संपत्ति पहले उसके पति के कानूनी वारिसों को मिल सकती है। उसके बाद ही उसके माता-पिता या उनके वारिसों का अधिकार बनता है।
एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है
हालांकि इस नियम का एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है। यदि महिला को कोई संपत्ति उसके माता-पिता से विरासत में मिली थी और उसकी मृत्यु बिना संतान के हो जाती है, तो ऐसी संपत्ति सामान्य स्थिति में उसके पति के परिवार को नहीं बल्कि उसके पिता के कानूनी वारिसों को वापस जा सकती है। यानी विरासत में मिली पैतृक संपत्ति और स्वयं अर्जित (Self-acquired) संपत्ति के नियम अलग-अलग हो सकते हैं।
समय रहते कर लेना चाहिए ये काम
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते समय में महिलाएं आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर हो चुकी हैं और कई मामलों में अपने माता-पिता की आर्थिक व सामाजिक जिम्मेदारियां भी निभाती हैं। ऐसे में अगर कोई महिला चाहती है कि उसकी स्वयं अर्जित संपत्ति उसकी इच्छा के अनुसार उसके माता-पिता, भाई-बहनों या किसी अन्य व्यक्ति को मिले, तो उसे समय रहते एक वैध वसीयत तैयार कर लेनी चाहिए। इससे भविष्य में उत्तराधिकार से जुड़े विवादों से भी बचा जा सकता है।









































