E20: पेट्रोल में एथनॉल मिलाने से सरकार को बंपर फायदा, 1.90 लाख करोड़ रुपये बची विदेशी मुद्रा

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E20 : पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने (एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल – EBP) की योजना भारत के लिए गेम चेंजर साबित हो रही है। सरकार ने इस कार्यक्रम का पुरजोर बचाव करते हुए कहा है कि इससे न केवल देश के चीनी उद्योग को नई मजबूती मिली है, बल्कि किसानों की आमदनी में भी बड़ा इजाफा हुआ है। खाद्य मंत्रालय के मुताबिक, साल 2014-15 से लेकर अब तक इस योजना की बदौलत देश को 1.90 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा (फॉरेन करेंसी) की बचत हुई है, जो पहले कच्चे तेल के आयात पर खर्च होती थी।

कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता हुई कम

न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक ‘अनाज एथनॉल विनिर्माता संघ’ (GEMA) के एक सम्मेलन के दौरान खाद्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव अश्विनी श्रीवास्तव ने बताया कि एथेनॉल अब देश की कृषि अर्थव्यवस्था का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2014-15 से 2026 के बीच एथेनॉल की सफल आपूर्ति के कारण देश को 310 लाख टन से अधिक कच्चे तेल की कम जरूरत पड़ी। विदेशी मुद्रा बचाने के साथ-साथ इस पर्यावरण-अनुकूल कदम से करीब 930 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के उत्सर्जन में भी कमी आई है, जो पर्यावरण के लिहाज से बड़ी उपलब्धि है।

गन्ना किसानों का बकाया ऐतिहासिक रूप से सबसे कम

शुरुआती दिनों में यह कार्यक्रम पूरी तरह गन्ना आधारित था। संयुक्त सचिव ने कहा कि ईबीपी कार्यक्रम के कारण गन्ना किसानों को उनकी फसलों का समय पर भुगतान सुनिश्चित हो सका है। इससे चीनी मिलों की माली हालत सुधरी है और वे वित्तीय रूप से मजबूत हुई हैं। नतीजा यह है कि आज देश में गन्ना किसानों का बकाया भुगतान ऐतिहासिक रूप से अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।

सरकार को अब नहीं देनी पड़ती निर्यात सब्सिडी

सरकारी खजाने पर बोझ कम होने का एक और उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि साल 2014-15 से 2020-21 के बीच केंद्र सरकार ने चीनी मिलों को सहारा देने के लिए करीब 14,600 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी थी। लेकिन साल 2021-22 के बाद से स्थिति पूरी तरह बदल गई। अब अतिरिक्त चीनी का इस्तेमाल सीधे एथेनॉल बनाने में किया जा रहा है, जिससे बाजार में चीनी की कीमतें भी संतुलित हैं और सरकार को अब कोई निर्यात सब्सिडी देने की जरूरत ही नहीं पड़ रही है।

मक्का बना एथनॉल उत्पादन का नया हीरो

गन्ने के अलावा अब मक्का (कॉर्न) भी एथनॉल उत्पादन के लिए एक प्रमुख कच्चे माल के रूप में उभरा है। वित्त वर्ष 2024-25 में तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को जो एथनॉल सप्लाई किया गया, उसमें 47 प्रतिशत हिस्सेदारी मक्के से बने एथनॉल की थी। वहीं मौजूदा आपूर्ति वर्ष में भी यह अब तक 36 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। अतिरिक्त फसलों के लिए नया बाजार तैयार होने से मक्का उगाने वाले किसानों को भी अब अपनी फसल के बेहतरीन दाम मिल रहे हैं।

उत्पादन क्षमता में 100 गुना की भारी बढ़ोतरी

देश में एथेनॉल के उत्पादन में जो तेजी आई है, वह आंकड़े खुद बयां करते हैं। साल 2013-14 में देश की कुल एथनॉल उत्पादन क्षमता महज 21 करोड़ लीटर के आसपास थी, जो आज बढ़कर करीब 2,000 करोड़ लीटर के विशाल स्तर पर पहुंच गई है। इसके अलावा, ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना’ के तहत चावल में टूटे दानों की सीमा 25% से घटाकर 10% करने के हालिया फैसले से भी फायदा होगा। इससे गरीबों को अच्छी क्वालिटी का चावल मिलेगा और बचे हुए अतिरिक्त टूटे चावल का इस्तेमाल एथनॉल बनाने जैसे औद्योगिक कामों में किया जा सकेगा।

वाहनों की सुरक्षा पर भ्रांतियों को किया खारिज

सम्मेलन के दौरान जीईएमए (GEMA) के अध्यक्ष सी के जैन ने एथनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol blending) से वाहनों को नुकसान पहुंचने की खबरों और भ्रांतियों को पूरी तरह खारिज किया। उन्होंने कहा कि देश में E20 (20% एथनॉल मिश्रित पेट्रोल) को लागू करने से पहले 2014 से 2018 तक चार सालों तक गहन रिसर्च और गाड़ियों को लंबी दूरी तक चलाकर कड़ा परीक्षण किया गया था। यह पूरी तरह सुरक्षित पाया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती अब उत्पादन नहीं, बल्कि इसे लेकर लोगों के बीच बनी गलत धारणा है, जिसे तथ्यों के आधार पर दूर किया जाना चाहिए। भविष्य में सरकार E20 से लेकर E100 (शत-प्रतिशत एथनॉल) ईंधन और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने की तैयारी में है।

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