संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अ-स्थायी सीट के लिए भारत ने 2028-29 के कार्यकाल के लिए अभी से अपना ‘शांति विजन’ (SHINE) अभियान शुरू कर दिया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 13 जुलाई को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आधिकारिक रूप से भारत के इस मुहिम की शुरुआत की। भारत का असली इरादा तो यूएनएससी की स्थायी सदस्यता हासिल करना है। फिलहाल, इस ‘शांति विजन’ (सेक्युरिंग हॉलिस्टिक एडवांसमेंट थ्रू नॉर्म्स, ट्रस्ट, इंटेग्रिटी) का उद्देश्य अ-स्थायी सीट को जीतना है। इस अभियान की शुरुआत के मौके पर कई मौके के राजदूत, राजनयिक और यूएन के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। यह अभियान 2028-29 के लिए है और इसके लिए जून 2027 में चुनाव होंगे। खास बात यह है कि यूएनएससी की अ-स्थायी सीट के लिए भारत ने करीब एक साल पहले अपने ‘शांति विजन’ कार्यक्रम की शुरुआत की है। वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच, आइए समझते हैं कि इस बार नई दिल्ली के सामने क्या चुनौतियां हैं।
एशिया-प्रशांत समूह में असल चुनौती कौन है?
इस सीट के लिए भारत का सीधा मुकाबला ताजिकिस्तान से है। ताजिकिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश है। चुनाव में इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) के 57 सदस्य देशों का ब्लॉक-वोटिंग (एकतरफा मतदान) का झुकाव ताजिकिस्तान की तरफ हो सकता है। यही कारण है कि भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क जाने से पहले कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान जैसे खाड़ी देशों का दौरा कर भारत के लिए समर्थन जुटाना शुरू कर दिया। लेकिन यह भी सच है कि केवल मुस्लिम देश होने भर से ही ताजिकिस्तान को सभी मुस्लिम देशों का समर्थन नहीं मिल जाएगा। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब जैसे मुस्लिम देशों के साथ भारत के बहुत ही गहरे रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध हैं।
यह चुनाव भारत के लिए कठिन क्यों है?
अतीत में भारत रिकॉर्ड 8 बार अ-स्थायी सदस्य रह चुका है और आमतौर पर आम सहमति से जीतता आया है। लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग हैं। संयुक्त राष्ट्र के चुनावों में वोटिंग गुप्त होती है। कूटनीति का एक कड़वा सच यह है कि कई बार छोटे देश बड़े और शक्तिशाली देशों के दबदबे के खिलाफ गुप्त रूप से वोट कर देते हैं। हाल ही में एक चुनाव में शक्तिशाली जर्मनी को ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल जैसे अपेक्षाकृत कम प्रभाव वाले देशों से हार का सामना करना पड़ा था। भारत इस जोखिम को हल्के में नहीं ले सकता। रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-गाजा संकट और अमेरिका-ईरान तनाव के कारण दुनिया गुटों में बंट चुकी है। ऐसे में हर एक वोट हासिल करने के लिए भारी कूटनीतिक मेहनत की जरूरत है।










































