किसानों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने, बारिश के पानी का संरक्षण करने और खेती को लाभ का धंधा बनाने के उद्देश्य से शासन द्वारा संचालित खेत तालाब योजना अब कटंगी जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत कोसमी में सवालों के घेरे में आ गई है। ग्राम पंचायत के एक किसान ने आरोप लगाया है कि खेत तालाब निर्माण के नाम पर सरकारी राशि तो निकाली गई, लेकिन कई स्थानों पर जमीन पर तालाब दिखाई ही नहीं दे रहे हैं। हालात यह हैं कि जिन स्थानों को रिकॉर्ड में खेत तालाब के रूप में दर्शाए जाने की बात कही जा रही है, उन्हीं स्थानों पर किसान धान की फसल लगा रहे हैं। मामले ने पंचायत स्तर पर योजनाओं की निगरानी और निर्माण कार्यों के सत्यापन की व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्राम कोसमी निवासी कृषक रविंद्र भगत ने पद्मेश न्यूज़ से चर्चा में बताया कि ग्राम पंचायत क्षेत्र में खेत तालाब योजना के अंतर्गत कई किसानों के खेतों में तालाब निर्माण के कार्य स्वीकृत किए गए थे। योजना का उद्देश्य किसानों को अपने खेत में पानी संग्रहित करने की सुविधा देना था, ताकि बारिश के बाद भी जरूरत के समय सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध रह सके। लेकिन उनके अनुसार पंचायत में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां तालाब निर्माण के नाम पर राशि खर्च होना तो रिकॉर्ड में दिखाई देता है, लेकिन जब मौके पर जाकर स्थिति देखी जाती है तो तालाब का कोई अस्तित्व नजर नहीं आता। रविंद्र भगत का कहना है कि उन्होंने इस संबंध में कई बार संबंधित जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को जानकारी दी। जिला मुख्यालय में आयोजित जनसुनवाई के दौरान भी उन्होंने मामले को उठाया और जांच की मांग की। इसके बावजूद अब तक उन्हें ऐसा कोई ठोस परिणाम दिखाई नहीं दिया, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि खेत तालाब योजना के तहत वास्तव में कितना काम हुआ और कितनी राशि खर्च की गई। किसान ने आरोप लगाया कि पंचायत स्तर पर खेत तालाब निर्माण के नाम पर लाखों रुपये की राशि निकाली गई, लेकिन कई जगह सिर्फ कागजी प्रक्रिया पूरी कर निर्माण कार्य पूरा होना दर्शा दिया गया। यदि वास्तव में तालाब का निर्माण हुआ है तो मौके पर उसकी खुदाई, आकार और जल संग्रहण की व्यवस्था स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए। लेकिन कई स्थानों पर ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि खेत में तालाब नहीं बना तो निर्माण कार्य पूरा होने की रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की गई और भुगतान किस आधार पर किया गया। मामले की तस्वीर बरसात के मौसम में और ज्यादा स्पष्ट नजर आ रही है। किसान के अनुसार जिन खेतों में तालाब निर्माण दर्शाया गया है, उनमें वर्तमान में धान की रोपाई की गई है। जहां तालाब होना चाहिए, वहां फसल खड़ी दिखाई दे रही है। ऐसे में ग्रामीणों का सवाल है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में तालाब बन चुका है तो फिर उसी स्थान पर खेती कैसे हो रही है। इस स्थिति ने खेत तालाब योजना के तहत हुए निर्माण कार्यों के भौतिक सत्यापन पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। रविंद्र भगत ने यह भी कहा कि खेत तालाब योजना केवल एक निर्माण योजना नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध किसानों की सिंचाई सुविधा और कृषि उत्पादन से है। यदि योजना की राशि खर्च होने के बाद भी किसान को तालाब नहीं मिलता है तो इसका नुकसान किसान के साथ-साथ सरकारी योजना के उद्देश्य को भी होता है। सरकार जिस उद्देश्य से किसानों को खेत में जल संरचना उपलब्ध कराने के लिए राशि देती है, यदि वह संरचना जमीन पर ही नहीं बनती तो योजना का पूरा लाभ अधूरा रह जाता है। किसान का दावा है कि जिले की अन्य ग्राम पंचायतों से भी खेत तालाब योजना को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। कई ग्रामीणों और हितग्राहियों ने अधिकारियों के समक्ष यह आरोप लगाया है कि कुछ स्थानों पर तालाब निर्माण के नाम पर राशि निकाल ली गई, लेकिन मौके पर अपेक्षित निर्माण नहीं हुआ। ऐसे मामलों की शिकायतें सामने आने के बावजूद यदि प्रभावी जांच नहीं होती है तो सरकारी योजनाओं की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।










































