MP High Court News: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने तीन सौ रुपये रिश्वत के तीन दशक पुराने मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए तत्कालीन पटवारी को दोषमुक्त किए जाने के फैसले को उचित ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ पैसों की बरामदगी से भ्रष्टाचार का अपराध सिद्ध नहीं होता।जबलपुर: मध्य प्रदेश में तीन सौ रुपये की रिश्वत से जुड़े एक मामले में करीब तीन दशक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद तत्कालीन पटवारी को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को दोषमुक्त किए जाने के फैसले को पूरी तरह उचित करार दिया है। यह पूरा मामला साल 1996 का है, जो अब जाकर अपने अंजाम तक पहुंचा है।
30 साल से चल रहा था मामला
सरकार की तरफ से सागर जिले के खुरई क्षेत्र के तत्कालीन पटवारी मुन्ना लाल के खिलाफ साल 1998 में हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी। जिला न्यायालय ने दिसंबर 1997 में आरोपी पटवारी को दोषमुक्त कर दिया था, जिसके खिलाफ सरकार ने ऊपरी अदालत का रुख किया था। अभियोजन के मुताबिक, 17 अक्टूबर 1996 को डुप्लीकेट भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका जारी करने के एवज में तत्कालीन पटवारी ने शिकायतकर्ता वीर सिंह से तीन सौ रुपये की रिश्वत ली थी, जिस दौरान लोकायुक्त ने उसे रंगे हाथों पकड़ा था।हाईकोर्ट एकलपीठ की अहम टिप्पणियां
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट जस्टिस संजय एस. कलगांवकर की एकलपीठ ने कई महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं को रेखांकित किया:
- सरकारी बकाया का एंगल: सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि राजस्व रिकॉर्ड के मुताबिक शिकायतकर्ता वीर सिंह पर 325 रुपये और ब्याज की सरकारी बकाया राशि थी। गवाहों और दस्तावेजों से यह संभावना जताई गई कि बरामद किए गए 300 रुपये असल में सरकारी बकाया की अदायगी से जुड़े हो सकते हैं।
- बयानों में असंगतियां: शिकायतकर्ता वीर सिंह के बयानों में कई स्तर पर विरोधाभास पाए गए। अलग-अलग मौकों पर कथित रिश्वत की मांग 450 और 500 रुपये बताई गई थी और यह भी स्पष्ट नहीं था कि मांग किस-किस की मौजूदगी में की गई।
- साक्ष्यों की कमी: अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ रिश्वत की रकम बरामद होने और फिनालफ्थेलीन परीक्षण हो जाने मात्र से अवैध रूप से रकम मांगने और स्वीकार करने का अपराध साबित नहीं होता। अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि वह रकम अवैध रूप से मांगी गई थी।
- ऑडियो रिकॉर्डिंग की सत्यता: अदालत ने यह भी पाया कि ट्रायल कोर्ट में रिश्वत की मांग से जुड़ी मूल रिकॉर्डिंग को सत्यापित नहीं किया गया था, न ही आरोपी की आवाज की पहचान कराई गई थी।
इन सभी कानूनी और तथ्यात्मक बिंदुओं के आधार पर हाईकोर्ट की एकलपीठ ने माना कि ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष पूरी तरह साक्ष्य और रिकॉर्ड पर आधारित था, इसलिए बरी किए जाने के फैसले में किसी भी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसी के साथ अदालत ने सरकार की अपील को निरस्त कर दिया।






































