आमतौर पर म्यूचुअल फंड को शेयर बाजार की तुलना में धीमी ग्रोथ वाला निवेश कहा जाता है। लेकिन, 6 साल में एक निवेशक ने म्यूचुअल फंड से 6 गुना ग्रोथ हासिल करते हुए 60 करोड़ का फंड बनाया।Mutual Fund में आमतौर पर लोग 10-12% या 12-15% सालाना रिटर्न की उम्मीद रखते हैं। लेकिन क्या कोई निवेशक 6 साल में ₹10 करोड़ के पोर्टफोलियो को ₹60 करोड़ तक पहुंचा सकता है? एक फंड मैनेजर के साथ बातचीत में ऐसे ही एक निवेशक की कहानी सामने आई, जिसने कथित तौर पर 6 साल में अपने ₹10 करोड़ के पोर्टफोलियो को ₹60 करोड़ तक पहुंचाया।
दिलचस्प बात यह है कि इसके पीछे किसी एक मल्टीबैगर स्टॉक या किसी ‘गुप्त फॉर्मूले’ की कहानी नहीं बताई गई। फिनफ्लुएंसर संजय कथूरिया के साथ बातचीत (पॉडकास्ट) में फंड मैनेजर ऋषभ नाहार बताते हैं कि इस निवेशक का पूरा खेल एसेट अलोकेशन (Asset Allocation) और डायवर्सिफिकेशन (Diversification) पर आधारित था।
₹10 करोड़ से ₹60 करोड़… कैसे?
रिषभ ने बताया कि यह निवेशक Mutual Fund के जरिए निवेश करता है और पिछले 6 साल में उसका पोर्टफोलियो ₹10 करोड़ से बढ़कर ₹60 करोड़ तक पहुंच गया। यानी पोर्टफोलियो करीब 6 गुना हुआ। अगर यह मान लिया जाए कि इस दौरान कोई अतिरिक्त पैसा नहीं लगाया गया और कोई निकासी भी नहीं हुई, तो ₹10 करोड़ से ₹60 करोड़ तक पहुंचने के लिए करीब 34.8% का सालाना CAGR बनता है।भारत महंगा लगा, तो चीन में लगाया पैसा
ऋषभ नाहार ने बताया कि इस निवेशक ने सिर्फ भारतीय बाजार पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग Global Markets में निवेश किया। खास तौर पर वह US और China के ETF को देखता था। निवेशक का तरीका किसी एक स्टॉक को चुनने के बजाय यह तय करना था कि पैसा किस मार्केट या एसेट क्लास में होना चाहिए। जब भारत का बाजार और खासकर Small Cap महंगे लग रहे थे, तब इस निवेशक ने चीन जैसे बाजारों की तरफ देखा। इस तरह अलग-अलग बाजारों में पैसा बांटने का मकसद यह था कि हर समय एक ही बाजार पर निर्भर नहीं रहना पड़े।
डायवर्सिफिकेशन में म्यूचुअल फंड की ताकत
ऋषभ नाहार ने Diversification को समझाते हुए Ray Dalio की All Weather Strategy का उदाहरण दिया। उनका तर्क था कि अलग-अलग एसेट क्लासेज लंबे समय में अच्छा रिटर्न दे सकती हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि सभी एक ही समय पर अच्छा प्रदर्शन करें। अगर पोर्टफोलिया में अलग-अलग तरह के एसेट हों, तो खराब दौर में पूरा पोर्टफोलिया एक साथ नहीं गिरता।
डायरेक्ट म्यूचुअल फंड से मिला फायदा
इसके अलावा इस निवेशक ने बाकी लोगों से अलग एक और फैसला किया कि डिस्ट्रीब्यूटर की जगह डायरेक्ट Mutual Fund में पैसा लगाया और खुद फंड का Analysis करता था कि किस ETF में कितना अलोकेशन करना है। इसका मतलब साफ है कि सिर्फ म्यूचअल फंड चुनना ही रणनीति नहीं थी, बल्कि कौन सा फंड, किस मार्केट में और कितने समय के लिए लेना यह यह भी अहम है।
70/30 का फॉर्मूला
ऋषभ नाहार के मुताबिक मीडियम रिस्क और करीब 10 साल के इन्वेस्टमेंट होराइजन के साथ इस निवेशक ने अपने पोर्टफोलियो को 70/30 के फॉर्मूला के साथ मैनेज किया। इसमें 70% तक इक्विटी और करीब 30% तक कमोडिटी एसेट्स को रखा। कमोडिटी में खासतौर पर Gold को अहम हिस्सा बनाया गया।
‘चमत्कार’ नहीं, अलोकेशन का खेल
₹10 करोड़ से ₹60 करोड़ की यह कहानी सुनने में चमत्कार जैसी लग सकती है, लेकिन जिस रणनीति का जिक्र हुआ, वह काफी अलग है। यहां फोकस किसी एक स्टॉक या एक Mutual Fund पर नहीं था। पैसा अलग-अलग मार्केट और ETFs में बांटा गया और समय के साथ अलोकेशन बदला गया।एक्सपर्ट व्यू: यह जानकारी CFA और फिनफ्लूएंसर संजय कथूरिया और Qodeinvest के को-फाउंडर व फंड मैनेजर ऋषभ नाहार की बातचीत पर आधारित है। निजता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए निवेशक की पहचान को सार्वजनिक नहीं किया गया है।
डिस्क्लेमर: TIMES NOW नवभारत किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ या कमोडिटी में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।








































