Explained: कभी विदेशों से मंगाता था अनाज, अब दुनिया को खिला रहा भारत! कैसे बदली देश की कृषि की तस्वीर?

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Green Revolution Explained: हरित क्रांति, उन्नत बीज, सिंचाई, सरकारी खरीद और कृषि तकनीक ने भारत को खाद्यान्न की कमी से उबारकर बड़ा उत्पादक बनाया। हालांकि, कुपोषण, महंगाई और जल संकट चुनौतियां बनी हुई हैं।Green Revolution Explained : भारत की कृषि यात्रा किसी बड़े बदलाव से कम नहीं है। एक समय था, जब देश में लोगों की जरुरत के हिसाब से अनाज पैदा नहीं होता था। खाद्य संकट से निपटने के लिए भारत को दूसरे देशों से अनाज मंगाना पड़ता था। लेकिन आज तस्वीर काफी बदल चुकी है। भारत गेहूं और चावल जैसे प्रमुख अनाज का बड़ा उत्पादक है और दुनिया के कई देशों को चावल का निर्यात भी करता है। यह बदलाव एक दिन में नहीं आया। इसके पीछे वैज्ञानिक खेती, बेहतर बीज, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, किसानों को सरकारी मदद और फसल खरीद की व्यवस्था जैसे कई कारण हैं। हरित क्रांति ने भारत की कृषि को नई दिशा दी। इसके बाद खेती में नई तकनीक और बेहतर बीजों का इस्तेमाल बढ़ा। सरकार ने किसानों को उनकी उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) देने और अनाज की सरकारी खरीद की व्यवस्था को मजबूत किया। डेयरी सहकारी समितियों और बागवानी के विकास ने भी देश में खाद्य उत्पादन का दायरा बढ़ाया। हालांकि, आज भी कुपोषण, महंगाई, पानी की कमी और कुछ जरूरी खाद्य पदार्थों के आयात पर निर्भरता जैसी चुनौतियां मौजूद हैं।

हरित क्रांति ने कैसे बदली खेती की दिशा?

भारत में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में हरित क्रांति की अहम भूमिका रही। 1960 के दशक में गेहूं की अधिक उपज देने वाली किस्मों का इस्तेमाल बढ़ा। इनमें कल्याण सोना और सोनालिका जैसी किस्में प्रमुख थीं। इन बीजों से किसानों को बेहतर उत्पादन हासिल करने में मदद मिली। खासकर तब, जब उनके साथ पर्याप्त सिंचाई और उर्वरकों का इस्तेमाल किया गया। कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन, नॉर्मन बोरलॉग और भारतीय कृषि संस्थानों के प्रयासों ने इस बदलाव को आगे बढ़ाया। पंजाब, हरियाणा और उत्तर-पश्चिम भारत के दूसरे क्षेत्रों में गेहूं और चावल की खेती को विशेष बढ़ावा मिला। हरित क्रांति का मतलब केवल नए बीजों का इस्तेमाल नहीं था। इसके साथ खेती के तरीकों, सिंचाई, खाद और कृषि प्रबंधन में भी सुधार हुआ। समय के साथ वैज्ञानिकों ने अलग-अलग मौसम और मिट्टी के अनुकूल नई किस्में विकसित कीं। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने 2025-26 में विभिन्न फसलों की 339 किस्में जारी कीं। इसका उद्देश्य किसानों को बेहतर उत्पादन के साथ बीमारियों और बदलते पर्यावरण की चुनौतियों से निपटने में मदद देना है।

सिंचाई सुविधाओं ने किसानों को मानसून पर निर्भरता से बचाया

भारत में खेती लंबे समय तक मानसून पर बहुत ज्यादा निर्भर रही है। अगर बारिश कम होती थी, तो फसल खराब होने और उत्पादन घटने का खतरा बढ़ जाता था। नहरों, ट्यूबवेल, ग्रामीण बिजली और पानी के प्रबंधन की सुविधाओं के विस्तार ने इस स्थिति को बदलने में मदद की। सिंचाई की बेहतर व्यवस्था से किसान केवल बारिश के भरोसे नहीं रहे। वे रबी की फसल भी अधिक भरोसे के साथ उगा सके। कई क्षेत्रों में एक साल में एक से ज्यादा फसल लेना भी आसान हुआ। इससे जमीन से सालभर में मिलने वाला कुल उत्पादन बढ़ा। आर्थिक सर्वे 2025-26 के अनुसार, देश के कुल फसल क्षेत्र में सिंचित क्षेत्र की हिस्सेदारी 2001-02 में 41.7% थी, जो 2022-23 में बढ़कर 55.8% हो गई। इसके अलावा, ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ जैसी योजना के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा दिया गया। इन तरीकों से पानी को अधिक कुशलता से फसलों तक पहुंचाया जा सकता है। हालांकि, सिंचाई का विस्तार अपने आप में पर्याप्त नहीं है। पानी का इस्तेमाल जरूरत के मुताबिक करना भी जरूरी है, ताकि भूजल का स्तर लगातार नीचे न जाए।MSP और सरकारी खरीद से किसानों को मिला भरोसा

फसल पैदा करना ही काफी नहीं है। किसान को यह भरोसा भी चाहिए कि उसकी उपज बिकेगी और उसे उचित कीमत मिलेगी। इसी जरुरत को पूरा करने में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), सरकारी खरीद और भारतीय खाद्य निगम (FCI) की अहम भूमिका रही है। FCI की स्थापना 1965 में हुई थी। सरकारी खरीद व्यवस्था के तहत गेहूं और चावल जैसी फसलों की खरीद की जाती है। इससे किसानों को बाजार में कीमतों को लेकर होने वाली अनिश्चितता से कुछ हद तक सुरक्षा मिलती है। सरकार खरीदे गए अनाज का इस्तेमाल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए लोगों तक खाद्यान्न पहुंचाने और जरुरत के समय भंडार बनाए रखने में भी करती है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, रबी मार्केटिंग सत्र 2025-26 में सरकारी एजेंसियों ने 300 लाख टन गेहूं खरीदा। इससे करीब 25 लाख किसानों को लाभ हुआ। इस तरह अधिक उत्पादन करने वाले किसानों को अपनी उपज बेचने का भरोसा मिला और देश के लिए अनाज का भंडार तैयार करने में भी मदद मिली।

कर्ज, मशीनों और प्रशिक्षण से खेती हुई आसान

खेती में समय पर बीज, खाद और मशीनों की व्यवस्था जरूरी है। लेकिन कई किसानों के पास बुआई या कटाई के समय पर्याप्त पैसे नहीं होते। ग्रामीण बैंकों, सहकारी संस्थाओं और किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) जैसी सुविधाओं ने किसानों को कृषि कार्यों के लिए कर्ज उपलब्ध कराने में मदद की। दिए गए आंकड़ों के अनुसार, कृषि क्षेत्र में दिया जाने वाला कुल संस्थागत लोन 2013-14 में 7.30 लाख करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में बढ़कर 28.67 लाख करोड़ रुपये हो गया। इससे किसानों के लिए खेती में जरूरी निवेश करना आसान हुआ। मशीनों ने भी कृषि कार्यों की गति बढ़ाई है। हर किसान के लिए ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और दूसरी महंगी मशीनें खरीदना संभव नहीं होता। ऐसे में कस्टम हायरिंग सेंटर किसानों को किराये पर कृषि मशीनें उपलब्ध कराते हैं। अक्टूबर 2025 तक कृषि मशीनीकरण योजना के तहत देश में 25,689 ऐसे केंद्र स्थापित किए गए थे। इसके साथ कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK), कृषि विश्वविद्यालयों और किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने वैज्ञानिक खेती के तरीकों को किसानों तक पहुंचाने में मदद की। जून 2026 तक ICAR के तहत देश में 731 कृषि विज्ञान केंद्र स्थापित किए गए थे। इन केंद्रों के जरिए किसानों को नई किस्मों, कीट नियंत्रण, खाद के सही इस्तेमाल और खेती की बेहतर तकनीकों की जानकारी दी जाती है।

गेहूं-चावल से आगे बढ़ा खाद्य उत्पादन

भारत की खाद्य व्यवस्था में बदलाव केवल गेहूं और चावल तक सीमित नहीं रहा। सरकार ने दालों और दूसरी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए भी योजनाएं चलाईं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और पूर्वी भारत में हरित क्रांति लाने की पहल (BGREI) ने अलग-अलग क्षेत्रों में खेती को बढ़ावा देने का काम किया। BGREI की शुरुआत 2010-11 में हुई थी। इसके तहत बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल समेत सात राज्यों पर ध्यान दिया गया। इन क्षेत्रों में धान आधारित खेती की समस्याओं को दूर करने और उत्पादन सुधारने का प्रयास किया गया। दालों का उत्पादन भी बढ़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देश में दालों का उत्पादन 2006-07 के 142 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 256.8 लाख टन हो गया। दालें प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत हैं, इसलिए इनका उत्पादन बढ़ना पोषण और खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए जरूरी है।

खेती का दायरा दूध, फल और सब्जियों तक भी फैला। 1970 में शुरू हुए ऑपरेशन फ्लड ने दूध उत्पादकों को सहकारी समितियों और संगठित बाजारों से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। इससे किसानों को दूध बेचने के बेहतर अवसर मिले। भारत का दूध उत्पादन 2024-25 में 247 मिलियन टन तक पहुंच गया। वहीं, 2025-26 में बागवानी उत्पादन का अनुमान 377 मिलियन टन लगाया गया। इससे देश में भोजन की उपलब्धता और ग्रामीण आय के दूसरे स्रोतों का विस्तार हुआ।डारण और निर्यात ने भारत को बनाया बड़ा खाद्य उत्पादक

अगर फसल पैदा होने के बाद उसे सुरक्षित न रखा जाए, तो उसका बड़ा हिस्सा खराब हो सकता है। इसलिए गोदाम, परिवहन, प्रसंस्करण और वैज्ञानिक भंडारण की सुविधाएं खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी हैं। इन सुविधाओं की मदद से अनाज को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचाना और जरूरत के समय इस्तेमाल करना आसान होता है। सरकारी भंडार और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए भी अनाज को जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाया जाता है। इससे देश के एक हिस्से में अधिक उत्पादन होने पर दूसरे हिस्सों की जरूरत पूरी करने में मदद मिलती है। भारत का चावल निर्यात इस बदलाव का एक बड़ा उदाहरण है। दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में भारत ने करीब 2 करोड़ टन चावल का निर्यात किया। इससे पता चलता है कि देश अब केवल घरेलू जरूरतों के लिए उत्पादन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी बड़ी मात्रा में चावल उपलब्ध करा रहा है। हालांकि, निर्यात की क्षमता बनाए रखने के लिए घरेलू जरूरतों, सरकारी भंडार और किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

खाद्यान्न की भरमार के बावजूद क्यों बनी हुई हैं चुनौतियां?

देश में अनाज का उत्पादन बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन मिल रहा है। कई परिवारों की आमदनी इतनी नहीं होती कि वे नियमित रूप से दालें, फल, सब्जियां और दूध जैसे खाद्य पदार्थ खरीद सकें। घरेलू उपभोग व्यय सर्वे 2023-24 के अनुसार, ग्रामीण परिवारों के कुल उपभोग खर्च में भोजन की हिस्सेदारी 47.04% और शहरी परिवारों में 39.68% थी। ऐसे में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने पर परिवारों का बजट बिगड़ सकता है।

कुपोषण भी एक बड़ी समस्या है। उपलब्ध लेख के अनुसार, NFHS-6 के 2023-24 के आंकड़ों में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में 29.3% बौनापन और 5.2% गंभीर दुबलापन दर्ज किया गया। दूसरी ओर, 15 से 49 वर्ष की 30.7% महिलाओं का वजन अधिक था या वे मोटापे से प्रभावित थीं। इससे साफ है कि देश के सामने केवल भोजन उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि संतुलित और पौष्टिक आहार सुनिश्चित करने की भी चुनौती है। खाद्य सुरक्षा योजनाओं में सभी जरूरतमंद लोगों को शामिल करना भी जरूरी है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लाभार्थियों की संख्या का आधार 2011 की जनगणना के आंकड़े हैं। आबादी में बदलाव के साथ पात्र लोगों की पहचान और कवरेज को अपडेट करना जरूरी हो गया है।

जलवायु परिवर्तन और भूजल की कमी बढ़ा रही चिंता

खेती पर मौसम का सीधा असर पड़ता है। बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश, सूखा और बाढ़ फसलों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। मार्च 2026 के सरकारी आकलन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों के लिहाज से जांचे गए 651 कृषि जिलों में से 310 जिले संवेदनशील पाए गए। लंबे समय में तापमान और मौसम में बदलाव गेहूं जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार को भी प्रभावित कर सकते हैं।

इसके साथ भूजल का तेजी से इस्तेमाल भी चिंता का विषय है। 2025 के भूजल आकलन में 6,762 आकलन इकाइयों में से 730 को जरूरत से ज्यादा भूजल निकालने वाली श्रेणी में रखा गया। पंजाब में भूजल दोहन का स्तर 156% बताया गया, यानी वहां सालाना उपलब्ध माने गए भूजल संसाधन से अधिक पानी निकाला जा रहा था। अगर पानी का इस्तेमाल इसी तरह जारी रहा, तो सिंचाई की लागत बढ़ सकती है और भविष्य में खेती करना मुश्किल हो सकता है। इसलिए फसल उत्पादन बढ़ाने के साथ पानी बचाने और कम पानी में उगने वाली फसलों को बढ़ावा देना भी जरूरी है।

दाल और खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कैसे घटे?

भारत गेहूं और चावल के उत्पादन में मजबूत स्थिति में है, लेकिन सभी जरूरी खाद्य पदार्थों में आत्मनिर्भर नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश ने 2024-25 में करीब 160 लाख टन खाद्य तेल और 2025-26 में 59 लाख टन दालों का आयात किया। आयात से घरेलू मांग और आपूर्ति के बीच अंतर को पूरा करने में मदद मिलती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने, रुपये की विनिमय दर बदलने या आपूर्ति बाधित होने पर भारत में भी इन वस्तुओं की कीमतें प्रभावित हो सकती हैं। इस समस्या को कम करने के लिए दालों, तिलहनों और मोटे अनाज का घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरूरी है। किसानों को इन फसलों के लिए बेहतर बीज, उचित कीमत, खरीद की सुविधा और प्रसंस्करण केंद्र उपलब्ध कराए जाने चाहिए। इससे किसानों को फसल बदलने का भरोसा मिलेगा और आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।

उत्पादन के साथ पोषण और टिकाऊ खेती पर जोर

भारत को अपनी खाद्य सुरक्षा मजबूत बनाए रखने के लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। सबसे पहले, सरकारी खाद्य योजनाओं में पात्र लोगों को शामिल करने और शिकायतों का समय पर समाधान करने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में तकनीकी गड़बड़ी के कारण किसी जरूरतमंद को राशन से वंचित नहीं होना चाहिए।

दूसरा, बच्चों और महिलाओं के पोषण पर अधिक ध्यान देना होगा। आंगनवाड़ी केंद्रों और पीएम पोषण जैसी योजनाओं में स्थानीय जरूरतों के अनुसार दालें, सब्जियां, दूध और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं।

तीसरा, जलवायु के अनुकूल खेती को बढ़ावा देना जरूरी है। किसानों को सूखा और गर्मी सहने वाली फसलों की किस्में उपलब्ध कराने, सिंचाई का बेहतर प्रबंधन करने और फसल खराब होने पर समय पर मदद देने की जरूरत है। साथ ही, फल और सब्जियों को खराब होने से बचाने के लिए कोल्ड स्टोरेज, परिवहन और खाद्य प्रसंस्करण की सुविधाएं बढ़ानी होंगी।

सरकार को घरेलू उत्पादन, सरकारी भंडार, आयात और निर्यात के बीच संतुलन बनाकर रखना होगा। भारत ने खाद्यान्न की कमी से निकलकर बड़े उत्पादक देश बनने तक लंबा सफर तय किया है। अब अगला लक्ष्य यह होना चाहिए कि हर नागरिक को सस्ता, पौष्टिक और सुरक्षित भोजन मिले और खेती प्राकृतिक संसाधनों पर जरूरत से ज्यादा दबाव डाले बिना आगे बढ़े।

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