Jabalpur News: बुंदेली भाषा हमारी सांस्कृतिक धरोहर, काव्य गोष्ठी आयोजित

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जबलपर, नईदुनिया रिपोर्टर। बुंदेली भाषा का विशिष्ट सौंदर्य है। यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर भी है। बुंदेलखण्ड का खानपान, पहनावा-ओढ़ावा, चाल-व्यवहार, नृत्य-गीत, कला-कौशल का अपना महत्व है। बुंदेली संस्कृति में हमारी आध्यात्मिक, धार्मिक, साहित्यिक एवं बौद्धिक साधना का समन्वय स्पष्टत: देखने मिलता है। यह हमारे भौतिक एवं मानसिक क्षेत्र की प्रगति का सूचक भी है। बुंदेली भाषा विंध्य, बुंदेलखण्ड महाकोशल के अतिरिक्त झांसी, मउरानीपुर, महोबा में भी लोकप्रिय है। यह बात अभा बुंदेलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद द्वारा आनलाइन आयोजित बुंदेली मासिक काव्य गोष्ठी में अतिथियों ने व्यक्त किए। समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. विजय तिवारी किसलय थे। अध्यक्षता लक्ष्मी शर्मा ने की। स्वागताध्यक्ष संतोष नेमा एवं सारस्वत अतिथि डॉ. सलमा जमाल, विशिष्ट अतिथि केपी पाण्डेय एवं राजेश पाठक प्रवीण थे।

बोली का सम्मान करना सभी की जिम्मेदारी : समारोह के प्रारंभ में अर्चना गोस्वामी ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। संचालन आशुतोष तिवारी एवं प्रभा विश्वकर्मा शील ने बुंदेली में किया। आभार प्रतुल श्रीवास्तव द्वारा व्यक्त किया गया। अतिथियों ने कहा कि जिस क्षेत्र में रहते हैं वहां की परंपराओं, बोली का सम्मान करना सभी की जिम्मेदारी होती है। आज कल बुंदेली का महत्व समझा जा रहा है। इसलिए इसका उपयोग फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में भी हो रहा है। युवाओं को चाहिए कि वे भी अपनी बुंदेली को अपनाएं और उसे जन-जन तक पहुंचाने का काम करें। जिस तरह अन्य स्थानों पर रहने वालों को अपनी बोली पर गर्व होता है उसी तरह हमारे यहां भी लोगों को अपनी बोली पर गर्व होना चाहिए और उसे बोलने, पढ़ने लिखने की समझ भी होना चाहिए। बुंदेली में लेखन पहले की अपेक्षा जरूर बढ़ा है लेकिन अभी भी बुंदेली में और रचनाएं हो इसकी जरूरत है। जिससे बुंदेली को संरक्षित किया जा सके और इस कार्य में सभी का प्रयास जरूरी है।

इन रचनाओं की प्रस्तुति : द्वितीय सोपान में बुन्देली रचनाएं प्रस्तुत की गईं। जिनमें आपउ आप खुदई रिसा रहे का कर रहे सच्चाई समझ न पा रहे का कर रहे…., मोरे अंगना में रंग घटा छाई कहूं धूप तो कहूं पर छांई रे ….., के साथ ही भूल गए हम उन वीरों की गाथा को, दे गए जोन स्वतंत्रता हमको…. शामिल रहीं।

इन्होंने किया काव्य पाठ : काव्य गोष्ठी में लक्ष्मी शर्मा, प्रभा विश्वकर्मा शील, डॉ. संध्या जैन श्रुति, राजेश पाठक प्रवीण, संतोष नेमा संतोष, आशुतोष तिवारी, राजेंद्र मिश्रा, राजेंद्र जैन रतन, सुभाष जैन शलभ, डॉ. सलप नाथ यादव, किशन तिवारी भोपाल, डॉ. मनोरमा गुप्ता बांसुरी, कुंजीलाल चक्रवर्ती निर्झर, मिथलेश नायक, डॉ. आशा श्रीवास्तव, रत्ना ओझा रत्न, डॉ. सलमा जमाल, प्रमोद तिवारी मुनि, रविन्द्र यादव टीकमगढ़, वंदना सोनी विनम्र, विजय बेशर्म गाडरवारा, कविता नेमा, केपी पांडेय बृहद ने काव्य पाठ किया।

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