Indian female farmers: भारत में आधी महिला किसानों को कागजों में ‘किसान’ न मानकर ‘मददगार’ दर्ज किया जाता है। पहचान, लोन और संसाधनों की कमी से देश को सालाना 2 लाख करोड़ तक का नुकसान होता हैIndian female farmers : भारत के गांवों में दिन-रात खेतों में पसीना बहाने वाली आधी से ज्यादा महिलाओं को आज भी कागजों में ‘किसान’ का दर्जा नहीं मिला है। सरकारी आंकड़ों और समाज की नजर में उन्हें सिर्फ ‘पारिवारिक मददगार’ मान लिया जाता है। पहचान और सम्मान की इसी कमी के कारण देश की कृषि अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 1.2 से 2 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। एग्री-कॉमर्स मंच ‘आर्या.एजी’ (Arya.ag) की ताजा रिपोर्ट ’हर हार्वेस्ट 2026: भारतीय कृषि में महिलाओं के अदृश्य कार्यों की छुपी लागत’ में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।
खेती में महिला ‘मददगार’ या असली किसान?
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक रिपोर्ट में बताया गया है कि खेती-किसानी से जुड़ी करीब 50.5 प्रतिशत महिलाओं को ‘बिना वेतन के काम करने वाली मददगार’ के रूप में दर्ज किया जाता है, जबकि पुरुषों के लिए यह आंकड़ा केवल 21.7 प्रतिशत है। चूंकि सरकारी नियमों के तहत ‘मददगार’ को औपचारिक तौर पर ‘किसान’ नहीं माना जाता, इसलिए ये महिलाएं उन तमाम सरकारी सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं जो जमीन के मालिकाना हक या आधिकारिक किसान पहचान के आधार पर दी जाती हैं। इन्हें न तो सस्ता कृषि लोन मिल पाता है, न ही खाद-बीज पर मिलने वाली सब्सिडी, सरकारी खरीद योजनाओं और कृषि परामर्श सेवाओं का लाभ मिलता है।
संसाधनों की कमी से घट रहा उत्पादन
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, यदि महिला किसानों को भी पुरुषों के समान संसाधन, लोन और सुविधाएं मिलें, तो कृषि पैदावार में काफी बढ़ोतरी हो सकती है। भारत के लगभग 48.7 लाख करोड़ रुपये के कृषि सकल मूल्यवर्धन (GVA) के आधार पर देखें, तो संसाधनों के अभाव के कारण देश को सालाना 1.2 लाख करोड़ से 2 लाख करोड़ रुपये तक की पैदावार का नुकसान झेलना पड़ता है। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यह नुकसान महिलाओं की क्षमता या मेहनत की कमी के कारण नहीं, बल्कि उनके पास संसाधनों की कमी की वजह से हो रहा है।गांवों में महिलाओं के कंधों पर खेती का पूरा बोझ
आज के समय में भारत में महिलाओं को रोजगार देने वाला सबसे बड़ा जरिया कृषि क्षेत्र ही है। देश की कुल कामकाजी महिलाओं में से 64.4 प्रतिशत महिलाएं खेती से जुड़ी हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 76.9 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। पिछले कुछ वर्षों में जब से पुरुष रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, तब से गांव के खेतों को संभालने और रोजमर्रा की खेती-बाड़ी चलाने की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई है। खेती-बाड़ी से जुड़ी कुल आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी अब बढ़कर 48 प्रतिशत हो गई है, जो 2017-18 में लगभग 30 प्रतिशत थी।
योगदान ज्यादा, लेकिन जमीन पर हक बेहद कम
महिलाओं के विशाल योगदान और उनकी वास्तविक स्थिति के बीच चार गुना बड़ा अंतर मौजूद है। रिपोर्ट के अनुसार, जहां एक तरफ महिलाएं कृषि में 48 फीसदी भागीदारी निभा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ देश की कुल कृषि योग्य जमीन के केवल 11.72 प्रतिशत हिस्से पर ही उनका नियंत्रण है और मात्र 13.96 प्रतिशत जमीन की जोत की वे मालिक हैं। इसके अलावा, मजदूरी के मामले में भी उनके साथ भेदभाव होता है; समान काम करने के बावजूद महिला खेतिहर मजदूरों को पुरुषों की तुलना में 20 से 30 प्रतिशत तक कम मजदूरी दी जाती है।
बदलाव के लिए रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें
रिपोर्ट में इस लैंगिक असमानता को खत्म करने और कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई अहम सुझाव दिए गए हैं। महिलाओं को कागजों में केवल ‘मददगार’ न मानकर आधिकारिक तौर पर ‘किसान’ का दर्जा दिया जाए। महिला किसानों को बिना किसी अड़चन के आसान शर्तों पर सरकारी कृषि लोन और वित्तीय मदद उपलब्ध कराई जाए। उन्हें कृषि ड्रोन, आधुनिक मशीनरी, बाजार की नई तकनीकों और कृषि विशेषज्ञ सलाहकारों की सेवाएं दी जाएं ताकि वे बेहतर और आत्मनिर्भर खेती कर सकें










































