न्यूज़।बालाघाट।सरकार ने बच्चों के स्कूल बैग का वजन कम करने के नियम तो बना दिए पर धरातल पर उसका पालन नहीं हो पा रहा है। बच्चों के बस्तों का वजन कम नहीं होने से अभिभावक चिंतित है। लेकिन उनको नए नियम के बारे में मालूम ही नहीं हैं। छोटे-छोटे बच्चे रोजाना क्षमता से अधिक वजन वाले बस्ते कंधों पर लादकर स्कूल पहुंच रहे हैं। इसका असर उनके स्वास्थ्य और मानसिक विकास पर पड़ रहा है।अभिभावकों का कहना है कि स्कूलों में बच्चों को रोज सभी विषयों की किताबें और कॉपियां लाने के लिए कहा जाता है। इसके कारण बस्ता भारी हो जाता है। बस्ता को लेकर कोई नियम है। इसकी जानकारी उन्हें बिल्कुल भी नहीं है।
क्या कहता है नियम
बात अगर नियमों की करें तो नियम के मुताबिक छोटे बच्चों की पीठ पर बस्ते का बोझ ना के बराबर होना चाहिए।स्कूल बैग पॉलिसी 2020 के अनुसार कक्षा एक से दो के बच्चों के लिए 1.6 से 2.2 किग्र का बस्ता मान्य है। इससे अधिक वजन का बस्ता यदि बच्चा लेकर पहुंचता है तो स्कूल प्रबंधन पर कार्रवाई होगी। इसी प्रकार कक्षा तीन, चार और पांच में 1.7 किग्रा से 2.5 किग्रा का वजन होना चाहिए।इसी तरह कक्षा आठ और सात के लिए दो से तीन किग्रा एवं कक्षा आठ से नौ के लिए 2.5 से चार किग्रा वजन मान्य है। कक्षा 10वीं में 2.5 से 4.5 किग्रा का बैंग मान्य होगा, जबकि कक्षा 11वीं से 12वीं में अलग-अलग स्ट्रीम के अनुसार बैग का वजन निर्धारित किया गया है।लेकिन किसी भी निजी स्कूलों में इस नियम का पालन नहीं कराया जा रहा है वही कमीशन के चक्कर में अधिक कापियां किताब खरीदने को मजबूर कर बस्ते का बोझ लगातार बढ़ाया जा रहा है।
आयोग ने जांच के दिए थे निर्देश
बात अगर पिछले वर्ष की करें तो पिछले वर्ष मप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने पत्र जारी कर बस्तों की जांच के निर्देश दिए थे। हालांकि कुछ समय तक इसका पालन कराया गया, लेकिन अब स्थिति जस की तस है। वही इस वर्ष 20026 में ना ही प्रदेश स्तर से और ना ही जिला स्तर से ऐसे कोई आदेश जारी किए गए हैं, उधर जब आदेश ही नहीं आए तो इसका पालन करना तो मुमकिन ही नहीं है जिसके चलते निजी स्कूल वाले अपनी मनमानी कर बच्चों की पीठ पर बस्ते का बोझ बढ़ा रहे हैं जिन पर कार्यवाही करने की जहमत भी सम्बधितों द्वारा नहीं उठाई जा रही है।
स्कूल में बनाया जाए पुस्तक कॉर्नर या फिर हो लाकर व्यवस्था
इस समस्या का हल स्वयं स्कूल में ही निकल सकता है बच्चों के बस्ते के बोझ को कम करने के लिए स्कूल प्रबंधन द्वारा स्कूल के ही किसी कमरे में पुस्तक कॉर्नर की व्यवस्था बनानी चाहिए या फिर स्कूलों में लाकर की व्यवस्था करनी चाहिए।ताकि बच्चे अपनी पीठ पर भारी भरकम बोझ लाद कर स्कूल आने व स्कूल से उसी बोझ को लेकर घर जाने के लिए मजबूर ना हो। बल्कि कक्षा में बने कॉर्नर या फिर कक्षा में बने लॉकर में ही बच्चे अपनी कॉपी किताबों को व्यवस्थित करके रख सके। जब उनकी जरूरत हो वहां से निकाल कर पढ़ाई कर ले और जब स्कूल की छुट्टी हो तो इस लॉकर में अपनी किताबें रखकर घर वापस आ सके। लेकिन ऐसी व्यवस्था किसी भी निजी स्कूलों में दिखाई नहीं दे रही है।
क्या कहते है विशेषज्ञ
विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक भारी बस्ता ढोने से बच्चों में कमर दर्द, कंधों में दर्द, गर्दन की समस्या और रीढ़ की हड्डी पर प्रतिकूल, प्रभाव पड़ सकता है। शिक्षाविदों का मानना है कि स्कूलों को समय सारिणी इस प्रकार बनानी चाहिए कि प्रतिदिन सीमित विषयों की कॉपी किताब ही स्कूल लाना ले जाना पड़े।
नियम का उल्लंघन होने पर होगी कार्यवाही-बर्मन
इस पूरे मामले को लेकर की गई चर्चा के दौरान जिला शिक्षा केंद्र बालाघाट डीपीसी घनश्याम प्रसाद बर्मन ने बताया कि जिला शिक्षा अधिकारी के माध्यम से पहले से ही सभी निजी व सरकारी स्कूलों को निर्देशित किया गया है कि छोटे बच्चों के बस्ते का बोझ नियम के अनुसार होना चाहिए।बस्ते का बोझ निर्धारित रखना है, बोझ अधिक नहीं होना चाहिए।उसी के तहत निजी व सरकारी स्कूलों में कार्यक्रम बनाए गए हैं। यदि कहीं पर भी इस नियम का उल्लंघन होगा, तो निश्चित तौर पर कार्यवाही की जाएगी।उन्होंने आगे बताया कि इस दिशा में नियमों का पालन कराने के लिए पुनः सभी सरकारी व निजी स्कूलों को पत्र लिखकर निर्देशित किया जाएगा।एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि वर्तमान में किसी भी स्कूल पर इस मामले को लेकर कोई कार्यवाही नहीं की गई है। यदि कहीं से शिकायत आती है तो निश्चित तौर पर स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्यवाही की जाएगी।









































