तेल कंपनियों पर चौतरफा मार! हर दिन 1,600 करोड़ का घाटा, क्या अब बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?

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कच्चे माल की लागत में भारी बढ़ोतरी के बावजूद सरकारी तेल विपणन कंपनियों के पंप कीमतों को स्थिर रखे हुए हैं, जिसके कारण पेट्रोल पर नुकसान बढ़कर 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर हो गया है। सूत्रों ने यह जानकारी दी।

लंबे समय से पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर

पीटीआई (भाषा) की एक रिपोर्ट के अनुसार, कीमतों को एक दशक से अधिक पहले विनियमन-मुक्त किए जाने के बावजूद सार्वजनिक क्षेत्र की इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) ने अप्रैल 2022 से पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है।

इस दौरान वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव रहा। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने से लेकर इस साल की शुरुआत में लगभग 70 डॉलर तक गिरावट और फिर अमेरिका-इजराइल के ईरान पर हमलों के बाद पिछले महीने लगभग 120 डॉलर तक का उछाल।

तेल कंपनियों को हो रहा तगड़ा नुकसान

सूत्रों ने बताया कि पिछले महीने ये तीनों कंपनियां प्रतिदिन करीब 2,400 करोड़ रुपये का नुकसान उठा रही थीं, जो अब सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल पर 10-10 रुपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क में कटौती के बाद घटकर लगभग 1,600 करोड़ रुपये प्रतिदिन रह गया है। यह कटौती उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचाई गई बल्कि नुकसान की भरपाई में इस्तेमाल की गई।

उन्होंने बताया कि मार्च में हुए नुकसान ने जनवरी-फरवरी में हुई कमाई को पूरी तरह खत्म कर दिया है और ऐसे आसार हैं कि ये कंपनियां जनवरी-मार्च तिमाही में घाटा दर्ज करेंगी।

वैश्विक वित्तीय सेवा समूह मैक्वेरी ग्रुप की ’इंडिया फ्यूल रिटेल’ रिपोर्ट के अनुसार, ’’ पेट्रोल-डीजल की हाजिर कीमत 135-165 डॉलर प्रति बैरल होने पर भारत की तेल विपणन कंपनियों को प्रति लीटर पेट्रोल पर 18 रुपये और डीजल पर 35 रुपये का नुकसान होता है।’’

रिपोर्ट में कहा गया कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से विपणन नुकसान में करीब छह रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी होती है।

चुनाव के बाद बढ़ सकते हैं दाम

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे प्रमुख राज्यों में चुनाव के बाद ईंधन की खुदरा कीमतों में वृद्धि के आसार हैं। भारत ने 2025 में अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात किया और वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति वह अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है। इसमें लगभग 45 प्रतिशत आयात पश्चिम एशिया से, 35 प्रतिशत रूस से और छह प्रतिशत अमेरिका से हुआ। इसके बावजूद देश डीजल, पेट्रोल और विमान ईंधन जैसे प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों का शुद्ध निर्यातक बना रहा।

मार्च में सरकार द्वारा उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती के बावजूद केंद्रीय करों में गिरावट का रुख जारी है और अब ये पेट्रोल पर 11.9 रुपये प्रति लीटर तथा डीजल पर 7.8 रुपये प्रति लीटर हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान कीमतों पर उत्पाद शुल्क को पूरी तरह समाप्त करने से भी तेल विपणन कंपनियों के नुकसान की पूरी भरपाई नहीं होगी। राज्य स्तर पर वैट दरें हालांकि लगभग स्थिर बनी हुई हैं।

अतिरिक्त कर कटौती के वित्तीय प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 170 अरब लीटर खपत के अनुमान के आधार पर, उत्पाद शुल्क को पूरी तरह हटाने से सालाना लगभग 36 अरब डॉलर के राजस्व का नुकसान हो सकता है जिससे राजकोषीय घाटा लगभग 80 आधार अंक बढ़ सकता है।

सरकारी राजस्व में ईंधन उत्पाद शुल्क का योगदान पहले ही घटकर वित्त वर्ष 2025-26 में करीब आठ प्रतिशत रह गया है जो वित्त वर्ष 2016-17 में 22 प्रतिशत था। अब यह राजकोषीय घाटे के पांचवें हिस्से से भी कम है जो पहले 45 प्रतिशत तक था।

कच्चे तेल की ऊंची कीमतें जोखिम कर रहीं उत्पन्न

कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के बाहरी संतुलन के लिए भी जोखिम उत्पन्न करती हैं। चालू खाते का घाटा जो 2025 के मध्य में लगभग संतुलन में था, 2026 की पहली तिमाही में बढ़कर लगभग 20 अरब डॉलर होने का अनुमान है। अगर कच्चे तेल की कीमत में लगातार 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि होती है तो बिना किसी नीतिगत हस्तक्षेप के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के लगभग 30 आधार अंक तक घाटा बढ़ सकता है।

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