नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर किसी पत्नी के खिलाफ व्यभिचार (एडल्टरी) के आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं, तो उसे अंतरिम भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता। शुक्रवार को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि व्यभिचार से जुड़े मामले के अंतिम निपटारे तक पत्नी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों का यह मानना त्रुटिपूर्ण होगा कि ऐसे आरोप पर निर्णय केवल सुनवाई के अंतिम चरण में ही किया जा सकता है।
एडल्टरी साबित होने पर पत्नी को नहीं मिलेगी एडल्टरी
सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा, ‘चूंकि, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125(4) में यह प्रावधान है कि अगर व्यभिचार का आरोप साबित हो जाता है, तो पत्नी न तो अंतरिम और न ही अंतिम गुजारा-भत्ता की हकदार होगी। इसलिए हमारा मत है कि अगर पति धारा 125(4) के तहत आवेदन करता है और शुरू में ही सबूतों के आधार पर प्रथम दृष्टया आरोप साबित कर देता है, तो अंतरिम गुजारा-भत्ता पर रोक लगाई जा सकती है।’
‘पेश करने होंगे ठोस सबूत’
अदालत ने कहा कि व्यभिचार से जुड़े मामलों में अक्सर परिस्थिति और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की गहन जांच करनी पड़ती है, जिसमें समय लगता है। ऐसे में अंतिम फैसले तक इंतजार करना कानून की मंशा के विपरीत होगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं होगा। पति को ऐसे ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश करने होंगे, जो पहली नजर में ही आरोपों की पुष्टि करते हों।










































