Madhya Pradesh High Court on Police Protection: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने अंतरधार्मिक विवाह करने वाले एक दंपत्ति को चौबीसों घंटे पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने से इनकार करते हुए कहा है कि केवल सामान्य आशंकाओं या संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर निरंतर व्यक्तिगत सुरक्षा प्रदान किए जाने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने कहा, ‘इस तरह की विशेष सुरक्षा की गुहार करने वाली हर रिट याचिका में खतरे के स्पष्ट सबूत होने चाहिए। केवल सामान्य आशंकाओं या संदिग्ध वाहनों के दिखने जैसी अलग-थलग घटनाओं के आधार पर निजी सशस्त्र सुरक्षा नहीं दी जा सकती। ऐसे मामलों में आमतौर पर नियमित पुलिस गश्त और जांच पर्याप्त होती है’
कपल ने क्यों मांगी थी सुरक्षा?
अदालत ने रतलाम शहर में रहने वाली एक महिला और उसके पति की दायर रिट याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। याचिका में दंपत्ति ने एक अज्ञात व्यक्ति द्वारा उनकी कार रोकने के प्रयास, एक संदिग्ध वाहन के उनके घर के आस-पास मंडराने और अन्य घटनाओं का हवाला दिया था और चौबीसों घंटे पुलिस सुरक्षा व रात के समय विशेष सुरक्षा प्रदान किए जाने की गुहार की थी।याचिका के मुताबिक, दंपत्ति ने दिल्ली के एक आर्य समाज मंदिर में 2019 के दौरान हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था। याचिका में कहा गया कि विवाह से पहले महिला इस्लाम का पालन करती थी और उसने अपनी इच्छा से हिंदू धर्म अपना लिया था।
याचिका के अनुसार महिला ने जब अपने माता-पिता को शादी और धर्म परिवर्तन की जानकारी दी, तो इसके तुरंत बाद दंपत्ति को महिला के परिजनों और अन्य व्यक्तियों की ओर से उनके जीवन और सुरक्षा के लिए गंभीर धमकियां मिलने लगीं। धमकियां जारी रहने पर वर्ष 2022 में महिला ने उच्च न्यायालय का रुख किया था। अदालत ने रतलाम के पुलिस अधीक्षक को दंपत्ति के आवेदन पर कानून के अनुसार विचार करने का निर्देश दिया था जिसके बाद उन्हें सुरक्षा प्रदान की गई थी।
बिना बंदूक व मोबाइल वाला जवान मिला
दंपत्ति ने मौजूदा रिट याचिका में उच्च न्यायालय से कहा कि 13 अप्रैल को बिना कोई प्रशासनिक कारण बताए उनकी सुरक्षा में तैनात बंदूकधारी कर्मी को हटा दिया गया और उसकी जगह होमगार्ड के एक जवान को तैनात कर दिया गया जिसके पास न तो बंदूक थी और न ही मोबाइल फोन।
उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दंपत्ति की याचिका और इसमें मांगी गई राहतों पर जोरदार आपत्ति जताई गई।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड के अवलोकन के बाद कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का संवैधानिक अधिकार हालांकि सर्वोपरि है, लेकिन किसी विशिष्ट सुरक्षा कर्मी की निरंतर तैनाती के वास्ते आदेश जारी करने के लिए कड़ी जांच-पड़ताल की आवश्यकता होती है।
स्पष्ट, ठोस और निर्विवाद सबूतों का अभाव
एकल पीठ ने इस प्रवृत्ति पर चिंता भी जताई कि लगभग हर अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह के मामले में दंपत्ति निरंतर पुलिस सुरक्षा की गुहार करते हुए रिट याचिकाएं दायर कर देते हैं, लेकिन इनमें स्पष्ट, ठोस और निर्विवाद सबूतों का अभाव होता है।
पीठ ने कहा कि अदालत सुरक्षा देने के नाम पर ‘सुरक्षा प्रतिष्ठान’ की भूमिका नहीं निभा सकती और सुरक्षा तैनाती के सटीक तौर-तरीके तय करने के लिए व्यापक आदेश जारी नहीं कर सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने वर्ष 2022 में रतलाम के पुलिस अधीक्षक को याचिकाकर्ताओं के आवेदन पर कानूनन विचार करने का निर्देश भर दिया था और इसे दंपत्ति को पूरे 24 घंटे की स्थायी सुरक्षा प्रदान करने का न्यायिक आदेश नहीं माना जा सकता।
उच्च न्यायालय ने दंपत्ति की रिट याचिका खारिज कर दी और कहा कि उनकी सुरक्षा व्यवस्था के सूक्ष्म प्रबंधन के बारे में चाही गईं विशिष्ट राहतें रिट क्षेत्राधिकार के तहत प्रदान नहीं की जा सकतीं।
अदालत ने हालांकि कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस-प्रशासन का पूर्ण वैधानिक और संवैधानिक कर्तव्य है और याचिकाकर्ता आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय पुलिस की मदद ले सकते हैं। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि स्थानीय पुलिस अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे मामले की गंभीरता पर ध्यान दें और इस तरह के मुकदमों में सर्वोच्च न्यायालय के तय उपचारात्मक व निवारक दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करें।










































