Indore IDA Ground Rent: इंदौर में रीजनल पार्क के सामने स्थित IDA के मैदान के किराए को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। राहुल गांधी के राजनीतिक आयोजन के लिए जहां कुछ ही दिनों का 14 लाख रुपये किराया वसूला गया था, वहीं 40 दिन के थोक पटाखा मार्केट के लिए किराया महज 5 से 7 लाख रुपये के बीच रहने की चर्चा है।इंदौर: जिले में मैदान के किराए को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। सवाल यह उठ रहा है कि जो मैदान राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के लिए सिर्फ 3-4 दिन के वास्ते 14 लाख रुपये में दिया गया था, उसी मैदान को 40 दिन के लिए थोक पटाखा मार्केट को मात्र 5 से 7 लाख रुपये में कैसे दिया जा रहा है? इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) की इस दोहरी नीति और कार्यप्रणाली पर अब गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं।
दुकानें बननी शुरू, पर अब तक किराया तय नहीं
पिपल्याराव में रीजनल पार्क के सामने स्थित मैदान पर 41 अस्थायी थोक दुकानें बनाई जा रही हैं। इसके साथ ही जेनरेटर रूम, लाइट टावर और पार्किंग की व्यवस्था भी की जानी है। हैरान करने वाली बात यह है कि दुकानें बनने का काम शुरू हो चुका है, लेकिन IDA ने अब तक न तो किराया जमा करवाया है और न ही आधिकारिक रूप से कोई राशि तय की है।शनिवार को व्यापारियों के प्रतिनिधिमंडल ने IDA अधिकारियों से मुलाकात की। सूत्रों का दावा है कि पिछले साल IDA ने पटाखा बाजार के लिए 5 लाख रुपये से भी कम किराया वसूला था, और इस साल यह बढ़कर करीब 7 लाख रुपये हो सकता है।
व्यापारी संघ ने मांगे 1-1 लाख रुपये
IDA की तरफ से अब तक कोई डिमांड नोट जारी न होने के कारण पटाखा व्यापारी एसोसिएशन ने फिलहाल प्रत्येक दुकान लगाने वाले व्यापारी से 1-1 लाख रुपये एकत्र करने को कहा है। इस राशि में मैदान का किराया, दुकान निर्माण, बिजली और सुरक्षा का खर्च शामिल है। हालांकि, कई व्यापारियों ने इस बात पर आपत्ति जताई है कि पिछले साल अधिकारियों के नाम पर हुए खर्च और हिसाब को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है। एसोसिएशन के अध्यक्ष शंकर होतचंदानी का कहना है कि सीईओ के लौटने के बाद अंतिम राशि तय होगी, जिसके चलते देरी हुई है।कांग्रेस ने उठाए पारदर्शिता पर सवाल
शहर कांग्रेस अध्यक्ष चिंटू चौकसे ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि जब कांग्रेस ने सामाजिक और गैर-व्यासायिक आयोजन के लिए 3-4 दिन का 14 लाख रुपये से ज्यादा किराया चुकाया, तो व्यावसायिक गतिविधि के लिए दरें कम कैसे हो सकती हैं। उन्होंने मांग की है कि पिछले और इस साल के सभी आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं अधिकारियों की मिलीभगत से शासन को राजस्व का चूना तो नहीं लगाया जा रहा। वहीं, IDA सीईओ परीक्षित झाड़े का कहना है कि हर साल नियमानुसार शुल्क लेकर ही मैदान दिया जाता है, और इस बार भी प्रक्रिया जारी है।










































