। आजादी का कड़ा संघर्ष, महात्मा गांधी की हुंकार, इंकलाब के गगनभेदी नारे और ब्रिटिश हुकूमत की लाठियां-गोलियां… यह सब आज हमारे लिए केवल इतिहास के पन्ने हो सकते हैं, लेकिन इंदौर जिले के चंद्रावतीगंज निवासी 106 वर्षीय बसंतीलाल पांडे के लिए यह उनके जीवन का वह जीवंत अध्याय है, जिसे वे आज भी अपनी आंखों के सामने महसूस करते हैं।
युवावस्था में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से हुई एक महज मुलाकात ने उनके भीतर ऐसी देशभक्ति की अलख जगाई कि वे अपनी जान की परवाह किए बिना स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। हाल ही में स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर, इंदौर में आयोजित हुए मुख्य समारोह में कैबिनेट मंत्री तुलसी सिलावट ने इस वयोवृद्ध सेनानी का शॉल और श्रीफल देकर भव्य सम्मान किया।जब 1935 में पहली बार हुए ‘बापू’ के दर्शन
- बसंतीलाल पांडे अपनी पुरानी यादों के पन्ने पलटते हुए बताते हैं कि बात साल 1935 की है। वे घरेलू सामान की खरीदारी करने के लिए चंद्रावतीगंज से इंदौर शहर आए थे। तभी उन्होंने बाजार में एक जगह भारी भीड़ और गहमागहमी देखी। जब उत्सुकतावश उन्होंने लोगों से पूछा कि यहां क्या माजरा है, तो भीड़ से आवाज आई- ‘बापू आए हैं।’
- शुरुआत में उन्हें लगा कि शायद किसी स्थानीय बुजुर्ग को सम्मान से बापू पुकारा जा रहा है। लेकिन करीब जाने पर पता चला कि वह शख्सियत कोई और नहीं, बल्कि खुद महात्मा गांधी थे। गांधीजी वहां मौजूद जनसैलाब को अंग्रेजी शासन के खिलाफ खड़े होने के लिए जागरूक कर रहे थे।
चारों तरफ ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ के नारे गूंज रहे थे। पुलिस लगातार लोगों को खदेड़ रही थी, फिर भी देशभक्तों का जोश रत्ती भर भी कम नहीं हो रहा था।
कान के पास से सनसनाती हुई निकली थी गोली
- गांधीजी के ओजस्वी विचारों ने बसंतीलाल के मन पर ऐसा गहरा प्रभाव डाला कि उन्होंने उसी पल से खुद को देश के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने फिरंगी सरकार के जुल्मों का डटकर सामना किया। उस खौफनाक दौर को याद करते हुए वे बताते हैं कि एक बार आंदोलन के दौरान पुलिस ने बल प्रयोग कर दिया।
- तभी एक बंदूक की गोली उनके कान के बिल्कुल करीब से सनसनाती हुई निकल गई। गोली की वह भयानक आवाज उन्हें आज भी याद है। मौत को इतने करीब से देखने के बावजूद उनके कदम पीछे नहीं हटे, क्योंकि दिल में सिर्फ ‘भारत माता’ की बेड़ियां काटने का जुनून सवार था।
गांव-गांव जाकर बांटे पर्चे, दो महीने काटी जेल
अंग्रेजों के खिलाफ इस बगावत के चलते ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया। अपने देश प्रेम की कीमत चुकाते हुए उन्होंने करीब दो महीने तक जेल की काल कोठरी में सजा काटी। जेल की कठिन परिस्थितियों और यातनाओं के बावजूद, इस सच्चे सपूत का हौसला कभी नहीं डगमगाया।
महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के संदेश को बसंतीलाल ने अपनी जिंदगी का परम लक्ष्य बना लिया था। उन्होंने अपने अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर ग्रामीण इलाकों का रुख किया। वे गांव-गांव जाकर गुपचुप तरीके से पर्चे बांटते थे और सोए हुए लोगों को आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित करते थे।







































