भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पिछले लंबे समय से स्थिर बनी हुई हैं, जो आम उपभोक्ताओं के लिए तो राहत की बात है, लेकिन पर्दे के पीछे सरकारी तेल कंपनियों की हालत पस्त हो रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आए भारी उछाल ने भारतीय तेल विपणन कंपनियों (OMCs) जैसे IOC, BPCL और HPCL के लिए बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे माल की लागत बढ़ने के बावजूद पंप पर कीमतें न बढ़ाने की वजह से कंपनियों को पेट्रोल पर ₹18 प्रति लीटर और डीजल पर ₹35 प्रति लीटर का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
ईरान वॉर का असर
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव ने तेल की कीमतों को अस्थिर कर दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध से शुरू हुआ यह सिलसिला अब अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तक पहुंच गया है। पिछले महीने कच्चे तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल तक जा पहुंचीं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत में हर $10 प्रति बैरल की वृद्धि होने पर तेल कंपनियों का विपणन नुकसान करीब ₹6 प्रति लीटर बढ़ जाता है। हालांकि सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर ₹10 प्रति लीटर उत्पाद शुल्क (Excise Duty) कम किया है, लेकिन यह कटौती ग्राहकों तक पहुंचने के बजाय कंपनियों के घाटे की भरपाई में इस्तेमाल की जा रही है।
कंपनियों को हर दिन ₹1,600 करोड़ का घाटा
सूत्रों की मानें तो पिछले महीने तक ये कंपनियां प्रतिदिन करीब ₹2,400 करोड़ का नुकसान उठा रही थीं। उत्पाद शुल्क में कटौती के बाद यह आंकड़ा अब ₹1,600 करोड़ प्रतिदिन पर आ गया है, जो कि अब भी बहुत बड़ा है। स्थिति इतनी गंभीर है कि जनवरी और फरवरी में हुई थोड़ी-बहुत कमाई भी मार्च के घाटे में बह गई है। ऐसे में पूरी संभावना है कि देश की प्रमुख तेल कंपनियां इस तिमाही में भारी घाटा दर्ज करेंगी। मैक्वेरी ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी स्तर पर रहीं, तो उत्पाद शुल्क को पूरी तरह खत्म करने के बाद भी कंपनियों के नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों का असर सीधा हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। रिपोर्ट में संकेत दिए गए हैं कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद ईंधन की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी की जा सकती है। अगर कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर माल ढुलाई और सार्वजनिक परिवहन पर पड़ेगा, जिससे महंगाई और बढ़ सकती है।
राजस्व और राजकोषीय घाटे की चुनौती
ईंधन पर लगने वाले टैक्स से सरकार को होने वाली कमाई में भी भारी गिरावट आई है। वित्त वर्ष 2016-17 में सरकारी राजस्व में ईंधन उत्पाद शुल्क का योगदान 22 प्रतिशत था, जो अब घटकर मात्र 8 प्रतिशत रह गया है। यदि सरकार कंपनियों को बचाने के लिए टैक्स में और कटौती करती है, तो इससे देश के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) के बढ़ने का खतरा है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें न केवल कंपनियों को डुबो रही हैं, बल्कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और चालू खाते के घाटे के लिए भी बड़ा जोखिम पैदा कर रही हैं।










































