नई दिल्ली: दिल्ली के एक प्राइवेट स्कूल में नौवीं क्लास का एक छात्र तीन साल से चुपचाप अपना भविष्य ऐसे सपने के इर्द-गिर्द बना रहा था, जिसका केंद्र जर्मनी था। सुपरकारों के प्रति दीवानगी के चलते, उसने छठी क्लास से ही जर्मन सीखना शुरू कर दिया था, ताकि वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर सके और फिर उस देश के मशहूर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में काम कर सके। लेकिन, अब उसके परिवार को डर है कि सीबीएसई की नई तीन-भाषा नीति की वजह से शायद उसे अपना यह प्लान बदलना पड़े।
कैसे पूरा होगा मेरे बेटे का सपना, एक पिता का सवाल
छात्र के पिता ने कहा कि ‘मेरे बेटे का लक्ष्य जर्मनी जाना, वहां की किसी यूनिवर्सिटी में पढ़ना और किसी टॉप ऑटोमोबाइल कंपनी में काम करना था। इसीलिए उसने तीन साल तक जर्मन पढ़ी। लेकिन अब उसका यह सपना टूट सकता है। साथ ही, वह नौवीं क्लास से बिल्कुल शुरू से संस्कृत सीखना कैसे शुरू करेगा?’ यह सवाल सिर्फ एक स्टूडेंट के पिता नहीं बल्कि शहर भर के क्लासरूम और WhatsApp ग्रुप में गूंज रहा है।










































