पूर्णिमा वर्धन और तपोनिल मुखर्जी | रुपये के अवमूल्यन और बाजार की उठापटक के बीच अक्सर सुनने में आता है कि आयात कम करो, पेट्रोल बचाओ, सोना कम खरीदो, विदेश में घूमने की बजाय देश में घूमो। ऐसी सलाह पहली नजर में तो सही लगती हैं, लेकिन इनकी दिक्कत यह है कि ये असल मसले को नहीं पकड़ती! सच तो यह है कि रुपया इसलिए कमजोर नहीं हो रहा क्योंकि भारतीय खर्च बहुत कर रहे हैं। दरअसल, हम पूंजी बाजार की समस्या को कारोबार की समस्या मान रहे हैं, जबकि असली मुद्दा पूंजी के प्रवाह और वित्तीय ढांचे की कमजोरी है, जिसका असर समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
इंडेक्स और रुपये के हालात
इस साल निफ्टी 50 इंडेक्स करीब 11% गिर चुका है और प्रमुख वैश्विक सूचकांकों में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वालों में है। दक्षिण कोरिया का KOSPI लगभग 50% ऊपर है, ताइवान का TAIEX 48% और जापान का Nikkei 18% ऊपर है। साल की शुरुआत में एक डॉलर की वैल्यू 89.86 रुपये थी, जो अब 96 के करीब है। यानी रुपया पांच महीने में 6.5% कमजोर हुआ है। RBI के दखल के बावजूद रुपये में गिरावट नहीं थमी और फॉरेन पोर्टफोलियो निवेशकों का बाजार से पैसा निकालने का सिलसिला जारी है।
कहां है असली समस्या?
भारत की समस्या मांग या बचत नहीं, बल्कि पूंजी के गलत वितरण की है। AI, विनिर्माण, रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में अवसर हैं, लेकिन निवेश की कमी है। विदेशी निवेशकों को भारत ऐसा बाजार नहीं लगता जहां वे आसानी से निवेश, विस्तार और सुरक्षित एग्जिट कर सकें। वे कारोबार में जोखिम तो उठा सकते हैं, लेकिन नीतिगत अनिश्चितता से बचना चाहते हैं। नियमों में बार-बार बदलाव और पूंजी निकासी में मुश्किलात के कारण वे सिंगापुर-दुबई जैसे बाजारों को प्राथमिकता देते हैं।










































