बैहर और बिरसा क्षेत्र में आदिवासी बच्चों की मौत का मामला अब सिर्फ प्रशासनिक सवाल नहीं रह गया है, बल्कि इसके राजनीतिक और सामाजिक असर भी दिखाई देने लगे हैं। इसी मुद्दे की जमीनी हकीकत जानने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके 12 सितंबर की सुबह करीब 9 बजे बालाघाट पहुंचे। उनके पहुंचने से पहले उनकी टीम प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर लौट चुकी थी। इसके बाद दीपके स्वयं प्रभावित इलाकों में जाकर मृत बच्चों के परिजनों से मिलने और पूरे मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए प्रभावितों के घर पहुचे ।
बालाघाट पहुंचने के बाद पद्मेश न्यूज़ से चर्चा में दीपके ने साफ कहा कि उनका दौरा महज खानापूर्ति के लिए नहीं है। वे उन गांवों तक जाएंगे, जहां बच्चों की मौत हुई है और पीड़ित परिवारों से सीधे मुलाकात कर उनकी पीड़ा और क्षेत्र की वास्तविक स्थिति समझेंगे। उन्होंने बच्चों की मौत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग उठाते हुए कहा कि केवल तबादले और प्रशासनिक फेरबदल से इतनी गंभीर घटना का अध्याय बंद नहीं किया जा सकता। जिम्मेदार अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई होनी चाहिए। इसी बीच दीपके के प्रभावित क्षेत्रों के दौरे ने उस समय नया मोड़ ले लिया, जब गांवों में कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और यूट्यूबर उनके पहुंचने से पहले ही मौजूद दिखाई दिए। जैसे ही दीपके प्रभावित क्षेत्र में पहुंचे, उनसे सवालों की बौछार शुरू हो गई। सबसे बड़ा सवाल यही था कि बच्चों की मौत का मामला सामने आने के इतने दिनों बाद वे अब क्यों पहुंचे? लगातार सवालों और कथित विरोध के चलते मौके का माहौल गर्माता नजर आया। दीपके ने भी सवालों से बचने के बजाय बातचीत का रुख पलटते हुए सीधे पूछा कि आखिर लगातार हो रही बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन है? हालांकि मौके पर इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया, लेकिन आरोप-प्रत्यारोप के बीच उनके दौरे में व्यवधान की स्थिति जरूर बन गई। उनके साथ मौजूद समर्थकों और बालाघाट से पहुंचे आदिवासी समाज के युवाओं ने आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने उनकी गाड़ियों के सामने तक अपने वाहन खड़े कर दिए, जिससे दौरे को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। तमाम व्यवधान के बावजूद दीपके कुछ प्रभावित गांवों तक पहुंचे और मृत बच्चों के परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने परिवारों से बच्चों की मौत, क्षेत्र में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं और कुपोषण की स्थिति को लेकर जानकारी ली। पीड़ित परिवारों से बातचीत के दौरान उन्होंने मामले को लेकर आगे भी आवाज उठाने और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय कराने की बात कही। इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और सवाल खड़ा हो गया कि आखिर दीपके के दौरे के दौरान इतना तनाव क्यों पैदा हुआ? दीपके पहले ही सोशल मीडिया पर आरोप लगा चुके थे कि उनके समर्थकों को पुलिस द्वारा उठाया जा रहा है और बालाघाट आने की सूचना देने वाले लोगों को भी पुलिस तलब कर रही है। बालाघाट पहुंचने के बाद उन्होंने एक बार फिर समर्थकों पर कथित पुलिस दबाव का मुद्दा उठाया और कहा कि अनावश्यक दबाव बनाया गया तो वे पीछे नहीं हटेंगे। दौरे के दौरान पैदा हुए विवाद और कथित व्यवधान का असर दीपके के मीडिया कार्यक्रम पर भी दिखाई दिया। उन्हें देर शाम बालाघाट में मीडिया से चर्चा और प्रेसवार्ता करनी थी, लेकिन दिनभर के घटनाक्रम के बाद उन्होंने मीडिया से दूरी बनाए रखी। देर शाम तक पत्रकार उनकी प्रेसवार्ता का इंतजार करते रहे, लेकिन अंततः दीपके रात करीब 8:30 से 9 बजे के बीच बालाघाट से नागपुर के लिए रवाना हो गए। उधर, उनके आगमन और कार्यक्रम को लेकर पुलिस की अलग-अलग एजेंसियों तथा पुलिसकर्मियों की सक्रियता भी शहर में दिखाई दी। वहीं कुछ भोपाल से आए सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी दीपके की मौजूदगी को लेकर सक्रिय नजर आए। इससे पूरे घटनाक्रम को लेकर शहर में तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गईं। सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुपों में भी दिनभर इस घटनाक्रम को लेकर बहस चलती रही। कुछ लोगों ने घटनाक्रम को बालाघाट की मीडिया से जोड़कर सवाल उठाए, लेकिन देर शाम तक सामने आए घटनाक्रम में ऐसा कोई स्पष्ट तथ्य सामने नहीं आया कि बालाघाट के स्थानीय मीडिया कर्मियों ने अभिजीत दीपके के दौरे को प्रभावित किया हो। यानी जिस दौरे को बच्चों की मौत के सवाल पर प्रशासन से जवाब मांगने के लिए शुरू किया गया था, वह दिन खत्म होते-होते खुद ही सवालों, आरोपों और कथित व्यवधानों के घेरे में आ गया। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आदिवासी बच्चों की मौत के मूल मुद्दे पर राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही तय होगी या फिर पूरा मामला दौरे के दौरान हुए विवाद, आरोप-प्रत्यारोप और सोशल मीडिया की बहस में ही उलझकर रह जाएगा?










































