देशभर में महाराष्ट्र के नागपुर की पहचान आरेंज सिटी के रूप में है। ‘नागपुरी संतरा” नाम से देश-विदेश में हर साल करोड़ों रुपये का कारोबार होता है। जबकि, इस पहचान को स्थापित करने में छिंदवाड़ा के संतरा उत्पादक किसानों का अह्म योगदान रहा है। लिहाजा अब अपनी मेहनत, अपनी पहचान की दिशा में काम किया जा रहा है। केंद्र की एक जिला एक उत्पाद योजना के तहत प्रशासन छिंदवाड़ा के संतरे को ‘सतपुड़ा आरेंज” नाम दिया है और पहचान के लिए लोगो तैयार करवाया जा रहा है।
दरअसल छिंदवाड़ा में बीते कई वर्षों से संतरे का उत्पादन होता आ रहा है। जिले के पांढुर्ना, सौंसर और बिछुआ ब्लाक में करीब 24 हजार 500 हेक्टेयर में संतरे के बगीचे हैं। जिनमें हर वर्ष लगभग चार लाख 49 हजार टन संतरा उत्पादित हो रहा है। छिंदवाड़ा से लगे नागपुर में संतरे की देश की प्रमुख मंडी है। जिसमें छिंदवाड़ा का 60 से 70 फीसद संतरा पहुंचता है। यहीं से देश के विभिन्न् राज्यों के साथ बांगलादेश से लेकर खाड़ी देशों तक संतरा निर्यात किया जाता है। चूंकि नागपुर मंडी से संतरे का कारोबार होता है इसलिए इसकी पहचान भी नागपुरी संतरे के नाम से स्थापित हो गई है।
केंद्र सरकार द्वारा स्थानीय उत्पाद को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई एक जिला एक उत्पाद योजना के तहत संतरे के लिए छिंदवाड़ा जिले का चयन होने बाद अपनी पहचान मिली है। प्रशासन ने इस पहचान को स्थापित करने के लिए जिले के संतरे की ‘सतपुड़ा आरेंज” के नाम से ब्रांडिंग, पैकेजिंग के साथ बाजार में लाने की योजना बनायी है। ब्रांडिंग के लिए लोगो व क्यूआर कोड तैयार करवाया जा रहा है। कोड को स्कैन करते ही कीमत समेत संतरे की पूरी जानकारी उपलब्ध होगी।
पतले छिलके का मीठा संतरा होता है
संतरा के बगीचे के मालिक प्रकाश वाहने पिछले बीस साल से संतरा की फसल ले रहे हैं। वे बताते हैं कि छिंदवाड़ा का संतरा पतले छिलके का होता है और मिठास भरपूर होती है। गर्मी में यहां मुख्य फसल आती है। इसके लिए व्यापारियों से फसल के आरंभ में ही सौदा हो जाता है। इसके बाद फल की तुड़वाई से लेकर बेचने का काम व्यापारी ही करता है। बीते कुछ वर्षों से कई उत्पादक अब अपनी फसल सीधे बहुराष्ट्रीय कपंनियों को भी बेच रहे हैं।
इनका कहना है
छिंदवाड़ा के संतरे की गुणवत्ता जूस के लिहाज से सबसे अच्छी मानी जाती है। अब जिले में ही इसके लिए बड़े किसानों के बीच प्रसंस्करण यूनिट लगाने पर भी विचार किया जा रहा है। हालांकि, कुछ यूनिट पहले से काम कर रही हैं लेकिन वे उत्पादकों की नहीं हैं। अलग पहचान के लिए ‘सतपुड़ा आरेंज” नाम दिया गया है। अपनी पहचान मिलने से मार्केट में यहां के संतरे की अलग मांग और कीमत होगी।










































