नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले का जिक्र करते हुए दबे-कुचले और हाशिए पर रहने वाले वर्गों के अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने नजीब मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि लंबे समय तक जेल में बंद रहना और मुकदमे में देरी जमानत का आधार हो सकता है। सीजेआई ने इसे उदाहरण के तौर पर पेश किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट जरूरत और गरीब लोगों को सच्चा और वास्तविक न्याय दिलाने में कामयाब रहा है।
खत्म की गई बंधुआ मजदूरी
स्वीडन में ‘कानून के शासन की रक्षा’ विषय पर बोलते हुए CJI ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने कानूनी सोच में अभूतपूर्व रचनात्मकता के दौर में कदम रखा है। यह संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय रूप से नए सिद्धांत और मिसालें कायम कर रही है। सीजेआई ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का जिक्र किया, जिसमें बंधुआ मजदूरी खत्म की गई, सम्मान के साथ जीने के अधिकार को बरकरार रखा गया और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ दिशा-निर्देश बनाए गए। उन्होंने कहा कि न्याय तभी कायम रह सकता है, जब फैसला करने वाला हर तरह के दबाव और प्रभाव से दूर रहे और केवल कानून और अपनी अंतरात्मा के प्रति ईमानदार रहे।









































