नई दिल्ली: फ्रांस और भारत के बीच दोस्ती की एक बड़ी वजह राफेल फाइटर जेट है। 4.5 जनरेशन का ये विमान भारतीय वायुसेना के जंगी बेड़े का हिस्सा है। इसी राफेल के दम पर भारत ने मई, 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी ठिकानों को तबाह कर दिया था। राफेल की बदौलत भारत से पाकिस्तान के साथ ही चीन भी खार खाता है। मगर, बड़ी बात यह है कि भारतीय वायुसेना के जंगी बेड़े का हिस्सा होने के बाद भी फ्रांस अब भी भारत पर खुलकर भरोसा नहीं कर पा रहा है। वह राफेल का सोर्स कोड और रडार IPR से जुड़ी तकनीकी जानकारी देने से बचता आया है। हालांकि, 114 डसॉल्ट राफेल मल्टी-रोल फाइटर जेट्स की अरबों डॉलर की खरीद को लेकर बातचीत आगे बढ़ रही है।
राफेल: भारतीय रक्षा मंत्रालय चाहता है इंटरफेस डेटा
- मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सोर्स कोड और रडार IPR से जुड़ी बाधाओं के बावजूद भारत-फ्रांस राफेल बातचीत आगे बढ़ रही है, क्योंकि रक्षा मंत्रालय स्वदेशी हथियारों को जोड़ने के लिए इंटरफेस डेटा की मांग कर रहा है।
- बताया जा रहा है कि रडार के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR) और एयरक्रॉफ्ट के कोर सॉफ्टवेयर तक पहुंच को लेकर चल रहे विवादों की वजह से समझौते में देरी हो सकती है। यह देरी ऐसे समय में हो रही है जब भारतीय वायु सेना (IAF) को अपने कम होते फाइटर स्क्वाड्रन की संख्या को बढ़ाने की सख्त जरूरत है।
- न्यूज़ एजेंसी ANI की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उम्मीद है कि भारत को 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने के लिए सरकार-से-सरकार के बीच प्रस्तावित डील के तहत अपने ‘ लेटर ऑफ रिक्वेस्ट ‘ ( LoR ) पर फ्रांस का आधिकारिक जवाब अगस्त के मध्य तक मिल जाएगा।
- रक्षा अधिकारियों ने ANI को बताया कि फ्रांस के अधिकारियों ने LoR पर अपना जवाब देने के लिए अगस्त के मध्य तक का समय मांगा है। भारत ने यह LoR इस साल मई में भेजा था। अधिकारियों ने कहा कि जब फ्रांस अपना जवाब सौंप देगा, तो दोनों पक्ष कीमत और अन्य अहम चीजों पर बात करेंगे।
- सरकार से सरकार के बीच समझौता प्रक्रिया
- इस साल की शुरुआत में, IAF ने राफेल खरीद के लिए रक्षा मंत्रालय (MoD) के सामने सीधे सरकार से सरकार के बीच समझौते का प्रस्ताव रखा। इस तरीके का मकसद मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) के लिए लंबी चलने वाली कॉम्पिटिटिव टेंडर प्रक्रिया से बचना है।
- लगभग 36 अरब डॉलर की इस प्रस्तावित डील में मेक इन इंडिया पहल पर बहुत जोर दिया गया है, जिसमें 60 फीसदी से ज्यादा सामान देश में ही बनाने का लक्ष्य है। इसे हासिल करने के लिए ज्यादातर मैन्युफैक्चरिंग महाराष्ट्र के नागपुर में डसॉल्ट की जॉइंट वेंचर फैसिलिटी में होगी।










































