आदिवासी अंचल में बच्चों की मौतों पर उबाल—जिम्मेदार कौन?

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31 बच्चों की मौत के दावे से मचा हड़कंप, सड़कों पर उतरा आदिवासी समाज
आदिवासी बच्चों की मौत पर राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग
पीड़ित परिवारों को 50-50 लाख मुआवजा, तीन वन्यजीव हमले में मृत महिलाओं के परिवारों को भी इतनी ही सहायता देने की मांग
दोनों घटनाओं की सीबीआई से स्वतंत्र जांच और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग, राष्ट्रपति के नाम कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन
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पदमेश न्यूज़।बालाघाट। आदिवासी अंचल में बीमारी से बच्चों की लगातार हो रही मौतों का मामला अब जिले की सीमाओं से बाहर पहुंच गया है।जिसको लेकर बालाघाट नगर में आए दिनों आदिवासी समाज संगठन द्वारा धरना प्रदर्शन ज्ञापन का आयोजन कर प्रदर्शन हो रहा है तो वही मामले में इंसाफ ना मिलने का आरोप लगाते हुए स्थानीय जनों द्वारा घटना पर जमकर आक्रोश जताया जा रहा है किसी कड़ी में राष्ट्रीय आदिवासी समन्वय समिति के बैनर तले देश के अलग-अलग आदिवासी क्षेत्रों से पहुंचे प्रतिनिधियों ने बालाघाट में प्रदर्शन कर शासन-प्रशासन के खिलाफ जमकर आक्रोश जताया। शनिवार को संगठनों ने आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं मूलभूत सुविधाओं की बदहाली को बच्चों की मौतों से जोड़ते हुए सरकार की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए।

पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने उमड़े समाजजन
जिले के बैगा एवं विशेष पिछड़ी जनजाति समुदाय से जुड़े परिवारों में लगातार हो रही मौतों को लेकर अब मामला राष्ट्रपति तक पहुंच गया है। ग्राम अडोरी, बैदारी, केड़े़कसा, कोरका एवं सोनवानी (मोहगांव) सहित बिरसा क्षेत्र में संक्रामक बीमारियों से हुई। बच्चों की मौत और कान्हा-किसली राष्ट्रीय उद्यान के समीप परसवाड़ा क्षेत्र के ग्राम परसपुर, शैला एवं मालखेड़ी में वन्यजीवों के हमले में तीन महिलाओं की मौत को गंभीर बताते हुए राष्ट्रपति के नाम कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा गया है।ज्ञापन में कहा गया है कि दोनों घटनाओं में प्रभावित परिवार विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा समुदाय से संबंधित हैं। इन घटनाओं से न केवल मृतकों के परिवारों को अपूरणीय क्षति हुई है, बल्कि क्षेत्र के लोगों में स्वास्थ्य व्यवस्था, सुरक्षा एवं प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न हुई है।

खनिज से करोड़ों की कमाई, फिर भी गांवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव
आदिवासी प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि आदिवासी क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर खनिज संपदा निकाली जा रही है, लेकिन इसका लाभ स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंच रहा। उनका कहना था कि खनिज से मिलने वाले सीएसआर मद का प्रभावी उपयोग आदिवासी क्षेत्रों के विकास में किया जाता तो आज इन क्षेत्रों की तस्वीर अलग होती।आदिवासी विकास के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य, सड़क, शिक्षा, पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव बना हुआ है।

गजेंद्र की मौत के बाद 31 बच्चों का दावा
शुक्रवार को बैगा आदिवासी ग्राम अतरिया आरामटोला निवासी साढ़े 10 वर्षीय गजेंद्र मरकाम की मौत हो गई। आदिवासी संगठनों का दावा है कि गजेंद्र की मौत को मिलाकर बीमारी के कारण अब तक 31 आदिवासी बच्चों की असमय मौत हो चुकी है। हालांकि, मौतों के इस आंकड़े की आधिकारिक पुष्टि और कारणों को लेकर जांच का विषय बना हुआ है।

हर मृत बच्चे के परिवार को 50 लाख देने की मांग
ज्ञापन में मांग की गई है कि संक्रामक बीमारियों से मृत 29 बच्चों के प्रत्येक परिवार को 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता/मुआवजा प्रदान किया जाए। इसी तरह वन्यजीवों के हमले में मृत तीन महिलाओं के आश्रित परिवारों को भी 50-50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की मांग रखी गई है।

सीबीआई जांच की मांग
ज्ञापन में दोनों घटनाओं की परिस्थितियों, प्रशासनिक लापरवाही, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा व्यवस्था तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका की केंद्रीय जांच ब्यूरो से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है। जांच में यदि किसी अधिकारी, कर्मचारी या अन्य व्यक्ति की लापरवाही अथवा दोष सिद्ध होता है तो उसके खिलाफ कठोर दंडात्मक एवं वैधानिक कार्रवाई करने की मांग की गई है।

प्रभावित गांवों में तत्काल स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग
ज्ञापन में संक्रामक बीमारियों से बच्चों की मौत के कारणों की विशेषज्ञ चिकित्सकीय जांच कराने तथा प्रभावित गांवों में तत्काल स्वास्थ्य शिविर, पर्याप्त दवाएं, चिकित्सकीय दल, स्वच्छ पेयजल एवं अन्य आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की गई है।वहीं कान्हा-किसली राष्ट्रीय उद्यान से लगे बैगा बाहुल्य गांवों में मा…

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