विधिविधान के साथ किया गया विसर्जन,
भुजलियां आपस में बांटकर लिया बड़े बुर्जुगों का आर्शीवाद
फोटो
पदमेश न्यूज़।बालाघाट जिला मुख्यालय सहित अन्य तहसीलों व ग्रामीण अंचलों में प्रतिवर्ष के अनुसार इस वर्ष भी भुजलिया का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।जिसके तहत जगह-जगह विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन किए गए।भाई-बहन के स्नेह और प्रेम का प्रतीक पर्व रक्षाबंधन के दूसरे दिन भुजलियां पर्व की सम्पूर्ण जिले में धूम देखने को मिली।जहां बड़े ही धूमधाम से हर्षोल्लास के साथ रविवार 29 अगस्त को जिले भर में यह पर्व मनाया गया।बताया गया कि इस पर्व को कजलिया के नाम से भी जाना जाता हैं।
सामुहिक रूप से पर्व मनाने का दिखा उत्साह
शनिवार को भुजरिया पर्व के अवसर पर स्थानीय लोगों सहित जिले के विभिन्न गांवो में भी इस पर्व को मनाने के लिए लोगों में खासा उत्साह देखा गया।जहां सामूहिक रूप से लोगों ने इस पर्व की खुशियां मनाई।भुजलियां पर घरों में श्रद्धालुओं द्वारा बोई गई भुजलियों को विसर्जन के लिये गांव व मोहल्ले के प्रमुख चौक चौराहों में महिलाओं व युवतियों द्वारा लाकर एकत्रित किया गया।जहां सामुहिक रूप से एक साथ ढोल नगाड़ों की धुनों पर नदी तट, तालाब, नहरों व अन्य जलाशयों में पहुंचकर भुजलिया की विधि विधान के साथ पूजा अर्चना कर विसर्जित किया गया।भुजलियां विसर्जन के पश्चात गांव के देव स्थान व घरों में पूजा स्थल में भुजली चढ़ाकर आपस में एक दूसरे को भुजलियां देकर बधाईयां दी गई।वही छोटो ने बड़े बुर्जुगों का चरण छूकर उनका आर्शीवाद प्राप्त किया।
नगर में इन जगहों पर दिखी भुजलिया की धूम
बात अगर बालाघाट नगरी क्षेत्र की करें तो, भुजलिया के पर्व विशेष पर नगरी क्षेत्र के मोतीतालाब, देवीतालाब, जागपुर घाट, व गायखुरी घाट में भुजलियां विसर्जन के लिये मेला सा माहौल देखा गया। इसके अलावा शहर से सटी ग्राम पंचायत कोसमी व खैरी में भी भुजलियां विसर्जन के लिये डीजे की धुनों के साथ शोभायात्रा निकाली गई। ग्राम पंचायत के समीप गांव की भुजलियां एकत्रित होकर विसर्जन के लिये नदी तालाब पहुंची। इस दौरान नई शादी वाले दूल्हे व दुल्हन भी सोलह श्रंगार में नजर आये। जहा वर्षो पुरानी परंपरा के अनुसार आज दिन विशेष पर शादी की मौर व मुकुट में लगी कलगी को भुजलियां के साथ विसर्जन किया गया।
कृषि और प्रकृति से जुड़ा है यह पर्व
बताया गया कि यह पर्व कृषि और प्रकृति से जुड़ा हुआ है।जो अच्छी वर्षा और फसल की कामना के साथ मनाया जाता है। सावन मास के पश्चात भादों मास प्रारंभ हो जाता हैं। भादो मास के प्रथम दिवस भुजलियां का पर्व मनाया जाता है।सावन मास में नवमी तिथि में बांस की टोकरी में भुजलिया बोयी गई थी।जिसकी रक्षाबंधन के दिन विधिवत पूजन हुई। दूसरे दिवस पूजन करने के पश्चात तालाब, नहर ,नदी या जहां पर जल उपलब्ध रहे वहां पर विसर्जन किया गया। ये परम्परा प्राचीन समय से चली आ रही है जिसका निवर्हन आज भी पारम्परिक रीति-रिवाज के अनुसार किया जा रहा है।परम्परा के अनुसार गांव में शादी होकर आने वाली नई नवेली दुल्हन/बहुओं द्वारा चौक चौराहों में एक साथ रखी गई भुजलियों की टोकरी की 5 से 7 बार परिक्रमा की जाती है। इस दौरान महिलाओं द्वारा पारम्परिक भुजलियां गीत का गायन किया गया। इस पर्व को मनाने के लिए सभी वर्गों में खासा उत्साह नजर आया। जहां भुजलिया विसर्जन के पश्चात देर शाम पर्व विशेष का समापन किया गया।









































