मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के नाम से सड़कों पर दौड़ाई जा रही कंडम बस
24 घंटे भी नहीं बीते जगह-जगह से उखाड़ने लगा स्टीकर
लोग ने कसा तंज कहा-क्या सरकार के पास नई बसों को खरीदने के लिए पैसे नही है।
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पदमेश न्यूज़।बालाघाट।मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के नाम पर बालाघाट से लंबी दूरी के रूटों पर दौड़ाई जा रही बसों को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। बसों का रंग-रूप बदलने के लिए रातों-रात उन पर स्टिकर चिपकाकर उन्हें नई बसों जैसा दिखाने का प्रयास किया गया, लेकिन बसों की वास्तविक स्थिति जस की तस बनी हुई है। हालत यह है कि स्टिकर लगाए जाने के 24 घंटे भी पूरे नहीं हुए और कई स्थानों से स्टिकर उखड़ने लगे हैं। इससे पूरी कवायद पर सवाल उठ रहे हैं।
करीब 14 पुरानी बसों को दिया नया नाम
प्राप्त जानकारी के अनुसार बालाघाट नगर से जबलपुर के लिए करीब 6 तथा भोपाल के लिए 4 बसें लंबी दूरी के रूट पर संचालित हो रही हैं। इन बसों को मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के तहत संचालित किया जा रहा है। इसके अलावा उड़ान कंपनी की 4 बसें भी पूर्व से ही अंडरटेकिंग गवर्नमेंट व्यवस्था के तहत संचालित बताई जा रही हैं। इस तरह बालाघाट से लंबी दूरी के लिए कुल 14 बसें सुगम परिवहन सेवा के नाम से सड़कों पर दौड़ रही हैं।
रंग बदला, पर हालत नहीं
बताया गया कि सूत्र सेवा की करीब 9 और उड़ान कम्पनी की करीब 4 बसों को मिलाकर ऐसी कुल 14 बसे बालाघाट से मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के नाम से दौड़ाई जा रही है।इन बसों को नई व्यवस्था के अनुरूप दिखाने के लिए रातों-रात इनका रंग-रूप बदल दिया गया। बसों पर नए स्टिकर लगाए गए और उन्हें मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के स्वरूप में तैयार कर दिया गया। लेकिन बसों की पुरानी हालत में सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए, यह सवाल अब यात्रियों और आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
स्टिकर के नीचे वही पुरानी खटारा बस!
लोगो का कहना है कि केवल बसों पर स्टिकर लगाने और बाहरी रंग-रूप बदलने से बस नई नहीं हो जाती। यदि बसें लंबे समय से चल रही हैं और उनमें मरम्मत की आवश्यकता है तो यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए पहले उनकी तकनीकी जांच एवं आवश्यक रिपेयरिंग कराई जानी चाहिए।लोगों का आरोप है कि बसों की वास्तविक स्थिति में सुधार किए बिना सिर्फ बाहर से उन्हें चकाचक दिखाने की कोशिश की गई है। खास बात यह है कि स्टिकर लगाए जाने के कुछ ही समय बाद कई स्थानों से इनके उखड़ने की स्थिति सामने आने लगी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब नई सेवा शुरू की गई तो बसों को नए स्वरूप में तैयार करने के साथ उनकी फिटनेस और मरम्मत पर कितना ध्यान दिया गया?
लंबे रूट पर दौड़ रही बसों की फिटनेस पर सवाल
बालाघाट से जबलपुर और भोपाल जैसे लंबे रूट पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में यात्री इन बसों से सफर करते हैं। लंबी दूरी के कारण बसों की तकनीकी स्थिति और फिटनेस यात्रियों की सुरक्षा से सीधे जुड़ी हुई है। ऐसे में यात्रियों का कहना है कि केवल बाहरी सजावट के बजाय बसों की अंदरूनी स्थिति, सीटें, खिड़कियां, दरवाजे, टायर, ब्रेक, लाइट और अन्य तकनीकी व्यवस्थाओं की भी जांच होनी चाहिए।यात्रियों के बीच यह चर्चा भी है कि यदि पुरानी बसों को ही नए नाम और नए स्टिकर के साथ सुगम परिवहन सेवा के रूप में संचालित किया जाना है तो कम से कम उनकी आवश्यक मरम्मत और फिटनेस सुनिश्चित की जाए, ताकि लंबी दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों को परेशानी का सामना न करना पड़े।
सिर्फ नाम, रंग और स्टिकर बदलने से सेवा सुगम नहीं होती
बसों पर रातों-रात स्टिकर चिपकाकर उनका स्वरूप बदलने की कवायद को लेकर शहर में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लोगों ने तंज कसते हुए कहा कि क्या सरकार के पास नई बसें खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं? यदि पुरानी बसों को ही नई सेवा के नाम पर चलाना है तो कम से कम उन्हें यात्रियों के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने की दिशा में काम होना चाहिए।लोगों का कहना है कि सरकार की परिवहन सेवा का उद्देश्य यात्रियों को बेहतर, सुरक्षित और सुगम यात्रा उपलब्ध कराना है। ऐसे में सिर्फ नाम, रंग और स्टिकर बदलने से सेवा सुगम नहीं हो सकती। बसों की वास्तविक स्थिति में सुधार भी उतना ही जरूरी है।
24 घंटे में उखड़ने लगा स्टिकर, गुणवत्ता पर सवाल
बसों पर लगाए गए स्टिकरों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि नई व्यवस्था के तहत बसों को नया स्वरूप दिया गया है तो स्टिकर की गुणवत्ता भी बेहतर होनी चाहिए।लेकिन 24 घंटे के भीत…






































