भोपाल। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने वाराणसी के चर्चित गंगा में नाव पर इफ्तार पार्टी प्रकरण का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि यदि गंगा में नाव पर बिरयानी खाना कानूनन अपराध नहीं है, तो युवाओं को गिरफ्तार कर तीन महीने तक जेल में क्यों रखा गया?
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों से यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि कानून का उपयोग नागरिकों की स्वतंत्रता सीमित करने के लिए किया जा रहा है।
समाज का भरोसा ही लोकतंत्र की मजबूती
न्यायमूर्ति भुइयां शनिवार को भोपाल स्थित राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय (एनएलआईयू) में न्यायमूर्ति जी.पी. सिंह चतुर्थ स्मृति व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। न्यायपालिका में जनविश्वास, न्यायिक निष्पक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आधारशिला बताते हुए उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है। जब तक समाज का भरोसा न्यायपालिका पर बना रहेगा, तब तक लोकतंत्र भी मजबूत रहेगा।
विधान ने दिया है बात रखने का अधिकार
अपने संबोधन में न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि देश में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा लगातार सिमटता दिखाई दे रहा है। अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को गिरफ्तार किया जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण की आवाज उठाने वालों के साथ भी कई बार अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है। उन्होंने कहा कि विरोध करना और अपनी बात रखना प्रत्येक नागरिक का संविधानिक अधिकार है तथा लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा बहस, संवाद और असहमति में निहित है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक प्रतिबंध न्यायपालिका में जनता के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं।









































