बीमारी से जूझते आदिवासी अंचल में थम नहीं रहा बच्चों के अस्पताल पहुंचने का सिलसिला

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सोमवार को जिला अस्पताल में 132 बच्चे भर्ती,
बेड और नर्सिंग स्टाफ की कमी; सीएस ने ज्वाइंट डायरेक्टर को लिखा पत्र
अब तक 30 बच्चों की मौत का दावा,
खसरा-मलेरिया से लेकर डायरिया, चर्मरोग और बुखार से पीड़ित बच्चे लगातार पहुंच रहे अस्पताल
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पदमेश न्यूज़ | बालाघाट।जिले के बैहर और परसवाड़ा क्षेत्र के आदिवासी अंचलों में बच्चों के बीमार होने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। मछुरदा, अडोरी, सोनगुड्डा, मोहनपुर सहित प्रभावित पंचायतों के ग्रामों और मंझरटोलों से लगातार बीमार बच्चों को जिला अस्पताल लाया जा रहा है। खसरा, मलेरिया, चर्मरोग, डायरिया, सर्दी-खांसी, बुखार सहित अन्य बीमारियों से पीड़ित बच्चों की संख्या लगातार अस्पताल पहुंच रही है।स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सोमवार को जिला अस्पताल में एक ही दिन में 132 बच्चों को भर्ती किया गया। अस्पताल में पहले से मौजूद मरीजों के बीच इतनी बड़ी संख्या में बच्चों के पहुंचने से बेड और स्वास्थ्यकर्मियों पर भी दबाव बढ़ गया है। जिला अस्पताल में उपलब्ध 50 बेड के बावजूद वैकल्पिक व्यवस्था कर बच्चों का उपचार किया जा रहा है।

सिविल सर्जन ने ज्वाइंट डायरेक्टर को लिखा पत्र,बेड व स्टाफ की करी मांग
उधर लगातार बढ़ते दबाव को देखते हुए सिविल सर्जन डॉ. निलय जैन ने स्वास्थ्य विभाग के जबलपुर स्थित ज्वाइंट डायरेक्टर को पत्र लिखकर अतिरिक्त बेड और स्टाफ नर्स उपलब्ध कराने की मांग की है। वहीं पीआईसीयू में भी वर्तमान में 13 बच्चे भर्ती बताए गए हैं।

लगातार जिला अस्पताल पहुच रहे मरीज
बताया गया कि डेढ़ माह से रोजाना प्रभावित गांवों से मरीज खास तौर पर बच्चे संक्रमण से ग्रसित होकर जिला अस्पताल पहुच रहे है।जिससे गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल उठ रहे है। प्रशासन की ओर से लगातार यह जानकारी दी जा रही है कि उपचार के बाद बच्चों को स्वस्थ होने पर अस्पताल से छुट्टी देकर घर भेजा जा रहा है। लेकिन दूसरी ओर प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों से नए बच्चों के लगातार अस्पताल पहुंचने का सिलसिला जारी है।यही स्थिति अब कई सवाल खड़े कर रही है। यदि बच्चों का उपचार होने के बाद उन्हें स्वस्थ कर घर भेजा जा रहा है तो प्रभावित गांवों से नए मरीजों के आने का क्रम लगातार क्यों बना हुआ है? क्या गांवों में बीमारी के वास्तविक कारणों और उसके प्रसार पर प्रभावी तरीके से नियंत्रण हो पा रहा है?ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार बीमारी बने रहने से यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या डिस्चार्ज होकर घर लौटने वाले बच्चों में दोबारा बीमारी के लक्षण सामने आ रहे हैं या प्रभावित क्षेत्रों में संक्रमण और अन्य बीमारियों के नए मामले लगातार बढ़ रहे हैं।

ढाई माह में 30 बच्चों की मौत का दावा
बीमारी से बच्चों की मौत का मामला जून के अंतिम सप्ताह में सामने आने के बाद से यह संकट लगातार चर्चा में बना हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अब तक 30 बच्चों की मौत होने का दावा किया जा रहा है। इनमें अंतिम मौत 10 वर्षीय काजल सैयाम की 29 जुलाई को बताई गई है।बीमार बच्चों में बड़ी संख्या बैगा और गोंड समुदाय से संबंधित बच्चों की बताई जा रही है। हालांकि अलग-अलग बच्चों में बीमारी के कारण अलग-अलग बताए जा रहे हैं और प्रत्येक मौत के वास्तविक चिकित्सकीय कारण का निर्धारण संबंधित मेडिकल जांच एवं रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जा सकता है।

गांवों में उपचार बनाम जिला अस्पताल की तस्वीर
प्रभावित आदिवासी अंचल के कई गांव जिला मुख्यालय से काफी दूर हैं। ऐसे में जब कोई बच्चा गंभीर रूप से बीमार पड़ता है तो परिजनों को उसे लेकर लंबी दूरी तय कर जिला अस्पताल पहुंचना पड़ता है।स्थानीय जानकारों का कहना है कि बीमारी से प्रभावित क्षेत्र के आसपास ही अस्थायी स्वास्थ्य सुविधा विकसित करने की जरूरत है। इससे गंभीर रूप से बीमार बच्चों को लंबी दूरी तय कर जिला मुख्यालय लाने की परेशानी कम हो सकती है और विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में प्रभावित क्षेत्र में ही उपचार उपलब्ध कराया जा सकता है।

जबलपुर मेडिकल कॉलेज से विशेषज्ञ डॉक्टर और स्टाफ बुलाने का सुझाव
बीमारी की गंभीरता को देखते हुए जानकारों ने सुझाव दिया है कि प्रभावित ग्रामों के आसपास कम से कम 50 बिस्तरों का अस्थायी अस्पताल बनाया जाए। यहां जबलपुर मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ चिकित्सकों और आवश्यक स्वास्थ्य स्टाफ को तैनात किया जाए।इस व्यवस्था से एक ओर प्रभावित गांवों के बच्चों को उनके घर के नजदीक बेहतर उपचार मिल सकेगा, वहीं दूसरी ओर जिला अस्पताल पर पड़ रहा अतिरिक्त दबाव भी कम होगा।आदिवासी अंचल के अधिकांश परिवार मजदूरी पर निर्भर बताए जाते हैं। ऐसे परिवारों के लिए बीमार बच्चे को लेकर बार-बार जिला मुख्यालय आना आर्थिक और मानसिक दोनों रूप से चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर उपचार की व्यवस्था बीमारी से निपटने के साथ-साथ प्रभावित परिवारों को भी बड़ी राहत दे सकती है।

बड़ा सवाल: आखिर कब थमेगा बीमारी का सिलसिला?
बच्चों के लगातार बीमार पड़ने और अस्पताल पहुंचने की स्थिति ने प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर प्रशासन द्वारा स्वास्थ्य शिविर, जांच और उपचार की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर जिला अस्पताल में लगातार नए बच्चों का भर्ती होना यह संकेत दे रहा है कि प्रभावित क्षेत्रों में बीमारी पर अभी पूरी तरह नियंत्रण नहीं पाया जा सका है।अब जरूरत केवल अस्पताल में बच्चों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रभावित गांवों में बीमारी के कारणों की पहचान, नियमित निगरानी, दवाओं की उपलब्धता, पोषण, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता और विशेषज्ञ चिकित्सकीय सेवाओं को मजबूत करने की भी है।

एक नजर में
सोमवार को भर्ती हुए 132 बच्चे
जिला अस्पताल में उपलब्ध बेड मात्र 50
पीआईसीयू में 13 बच्चे भर्ती बच्चे
सामान्य दिनों में 20 से 30 प्रतिदिन भर्ती होने वाले बच्चों की बताई गई संख्या
अब तक 30 बच्चों की मौत का दावा
प्रभावित क्षेत्र-मछुरदा | अडोरी | सोनगुड्डा | मोहनपुर | आसपास के ग्राम एवं मंझरटोले।इन क्षेत्रों से बीमार बच्चों को लगातार जिला अस्पताल लाए जाने की जानकारी सामने आ रही है।

स्वास्थ्य विभाग से तत्काल जरूरत
अतिरिक्त बेड की व्यवस्था
पर्याप्त स्टाफ नर्स की तैनाती
प्रभावित गांवों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की सेवाएं
बीमारी की नियमित निगरानी और जांच
गंभीर बच्चों के लिए तत्काल रेफरल एवं परिवहन व्यवस्था
प्रभावित क्षेत्र के नजदीक अस्थायी अस्पताल की स्थापना

मरीजों की संख्या अधिक, बनाई जा रही व्यवस्था- जैन
एक दिन में 132 बच्चे भर्ती होने से अस्पताल प्रबधन दबाव में है।दुरभाष पर की गई चर्चा के दौरान सिविल सर्जन डॉ. निलय जैन ने बताया कि आदिवासी अंचल में बच्चों के बीमार होने का सिलसिला शुरू होने के बाद से प्रभावित क्षेत्रों से रोजाना बड़ी संख्या में बच्चे जिला अस्पताल पहुंच रहे हैं। सामान्य तौर पर प्रतिदिन 20 से 30 बच्चों के भर्ती होने की बात सामने आ रही है।लेकिन सोमवार को यह संख्या अचानक बढ़कर 132 बच्चों तक पहुंच गई। अस्पताल प्रशासन के सामने इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को भर्ती कर उनका उपचार करने की चुनौती खड़ी हो गई।डॉ. जैन ने बताया कि जिला अस्पताल में बच्चों के लिए 50 बेड उपलब्ध हैं, लेकिन मरीजों की संख्या अधिक होने के कारण वैकल्पिक व्यवस्था बनाकर बच्चों को भर्ती किया जा रहा है। पीआईसीयू में भी 13 बच्चों का उपचार जारी है

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