मैहर: बंदरों के बढ़ते खौफ और लगातार हमलों से त्रस्त ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने अजीबोगरीब और विचलित करने वाली मांग रख दी है। यदि जल्द ही बंदरों को नहीं पकड़ा गया, तो इन ग्रामीणों ने राष्ट्रपति से ‘इच्छा मृत्यु’ की गुहार लगाई है। इस कदम ने पूरे इलाके में प्रशासनिक अमले के होश उड़ा दिए हैं।
घरों से लेकर स्कूलों तक बंदरों का तांडव, सहमे लोग
मैहर के ग्रामीण इलाकों में स्थिति यह हो चुकी है कि लोग अपने ही घरों में कैद रहने को मजबूर हैं। बंदरों के झुंड लगातार घरों, दुकानों, स्कूलों, खेतों और सार्वजनिक स्थलों पर धावा बोल रहे हैं। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि ये खूंखार बंदर संपत्ति और फसलों को भारी नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की जान के लिए भी बड़ा खतरा बन गए हैं। डर के मारे लोग अब घरों से बाहर निकलने से भी कतराने लगे हैं।
कलेक्टर को सौंपा गया राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन
शुक्रवार को आक्रोशित ग्रामीणों का एक समूह मैहर कलेक्टर कार्यालय पहुंचा। उन्होंने देश के राष्ट्रपति को संबोधित एक ज्ञापन सौंपते हुए तुरंत कड़े कदम उठाने की मांग की। ग्रामीणों ने दो-टूक शब्दों में चेतावनी दी कि यदि इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो उन्हें अपनी जीवन लीला समाप्त करने की अनुमति दी जाए। यह ज्ञापन क्षेत्र में फैली भारी निराशा और व्यवस्था के प्रति गुस्से का साफ प्रमाण है।
- इच्छा मृत्यु की धमकी: मैहर के ग्रामीणों ने बंदरों से परेशान होकर राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा है।
- व्यापक आतंक: बंदर घरों, स्कूलों और खेतों में घुसकर फसलें और सामान नष्ट कर रहे हैं।
- फंड की कमी का रोड़ा: पंचायतों के पास बंदर पकड़ने के खर्च को पूरा करने का कोई प्रावधान नहीं है।
- कानूनी पेंच: साल 2022 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम से हटने के बाद वन विभाग ने खर्च उठाने से इनकार कर दिया था।
फंड और स्पष्ट नीति का अभाव बना बड़ी मुसीबत
इस पूरे विवाद की जड़ एक प्रशासनिक पेचीदगी में छिपी है। साल 2022 में लाल मुंह वाले बंदरों को वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट की सूचियों से हटाए जाने के बाद, वन विभाग ने साफ कह दिया था कि वह इन्हें पकड़ने का खर्च नहीं उठाएगा। बड़ी इत्मा गांव के सरपंच प्रतिनिधि सुभाष पांडे ने बताया कि पंचायतों के पास विकास के कई मदों में फंड तो है, लेकिन बंदरों को पकड़वाने के खर्च के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं है। अन्य राज्यों में जहां जिला स्तर पर मानक संचालन प्रक्रिया और फिक्स रेट तय हैं, वहीं मध्य प्रदेश में ऐसा कोई तंत्र अब तक विकसित नहीं किया गया है।










































