नई दिल्ली: फुटबॉल विश्व कप में जब नॉर्वे की टीम मैच जीतती है, तो खिलाड़ी और हजारों दर्शक एक साथ चिल्लाते हैं – ‘हू…हू…हू…’। इसे वाइकिंग रोर कहा जाता है। यह केवल जीत का जश्न नहीं, बल्कि उन समुद्री योद्धाओं की परंपरा है जिन्होंने कभी यूरोप के बड़े हिस्से में अपनी बहादुरी और समुद्री कौशल से पहचान बनाई थी। फीफा वर्ल्ड कप 2026 में जीत के बाद नॉर्वे की टीम वाइकिंग रोर सेलिब्रेशन करते हैं। जिसके वीडियो खूब वायरल होते हैं।
कहां से हुई वाइकिंग की शुरुआत?
आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच स्कैंडिनेविया यानी आज के नॉर्वे, स्वीडन और डेनमार्क में रहने वाले लोग, जिन्हें आज दुनिया वाइकिंग्स या नॉर्समैन के नाम से जानती है, केवल लुटेरे नहीं थे। वे साहसी नाविक, व्यापारी और नए इलाकों की खोज करने वाले लोग भी थे। उन्होंने ब्रिटेन, आयरलैंड, फ्रांस, रूस और आइसलैंड तक बस्तियां बसाईं। माना जाता है कि कोलंबस से लगभग 500 साल पहले वाइकिंग नाविक एरिकसन उत्तरी अमेरिका के तट तक पहुंच चुके थे। वाइकिंग्स की सबसे बड़ी ताकत उनके बड़े जहाज थे। ये लंबे, हल्के और तेज जहाज उथले पानी में भी आसानी से चल सकते थे। इसी तकनीक ने उन्हें समुद्र का बेहतरीन नाविक बना दिया।लड़ाकू जज्बा टीम में दिखता
वाइकिंग्स की पहचान तलवार और कुल्हाड़ी से जुड़ी रही। लेकिन वे सिर्फ योद्धा नहीं थे। वे व्यापार करते थे, नए शहर बसाते थे और जिन इलाकों में पहुंचे, वहां की राजनीति और प्रशासन पर गहरा असर छोड़ गए। यही विरासत आज नॉर्वे की टीम से जुड़ गई है। मैच से पहले और बाद में खिलाड़ी और दर्शक मिलकर जो ‘वाइकिंग रोर’ लगाते हैं, वह पुरखों के लड़ाकू जज्बे का प्रतीक माना जाता है। यह संदेश भी है कि मैदान पर लड़ाई अनुशासन और टीम भावना से जीती जाती है। जब नॉर्वे मैदान पर उतरता है, तो उसकी वाइकिंग विरासत इतिहास को वर्तमान से जोड़ती है।










































