शुभ और अशुभ कर्मों का अलग-अलग संग्रह होता है, स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे से ये कटते नहीं। अर्थात् पापों से पुण्य और पुण्यों से पाप नहीं कटते। शास्त्रों में वर्णन है कि अगर मनुष्य प्रायश्चित रूप से शुभ कर्म करता है, तो ही उसके पाप कट सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति इस जन्म में दुख पा रहा है, तो यह उसके किसी पूर्व जन्म में किए हुए पापों का फल है। इस जन्म में किए गए पुण्यों का हिसाब-किताब अगले जन्म में होगा। इससे यह पता चलता है कि अपने किसी पूर्व जन्म में किए हुए पुण्य के कारण पाप करने वाला वर्तमान में सुख भोगता है।
गीता में स्पष्ट कहा गया है, मनुष्य को कर्म करने का पूर्ण अधिकार है, फल प्राप्ति में नहीं, क्योंकि कुछ भी करना पुरुषार्थ के अधीन है और प्रतिफल प्राप्त होना, न होना, कम या ज्यादा होना प्रारब्ध के अधीन है। इस बात को समझने वाला कभी दुखी नहीं होता। अगर कोई मनुष्य भगवान की आज्ञा के अनुसार उनकी ही प्रसन्नता के लिए भगवान को अर्पण कर सब कार्य करे तो उसे भगवान दूसरों की अपेक्षा अधिक देते हैं। जैसे शरीर और संसार एक ही है, ऐसे ही स्वयं और परमात्मा एक ही है, जिसका बोध होने पर व्यक्ति सांसारिक पीड़ाओं से मुक्त हो जाता है।












































