असफल उम्मीदवार बाद में भर्ती चयन प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते, एमपी हाईकोर्ट ने रद्द कर दी असिस्टेंट लाइब्रेरियन की याचिका

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MP High Court News: एमपी हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि जो उम्मीदवार बिना किसी आपत्ति के किसी चयन प्रक्रिया में खुद हिस्सा लेता है, वह असफल होने के बाद उस प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकता। जस्टिस विवेक अग्रवाल की बेंच ने यह टिप्पणी डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर के सहायक लाइब्रेरियन पद से जुड़ी याचिका को खारिज करते हुए की।जबलपुर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कोई भी उम्मीदवार किसी चयन प्रक्रिया में स्वेच्छा से भाग लेने के बाद, परिणाम अपने पक्ष में न आने पर उसी प्रक्रिया की वैधता को चुनौती नहीं दे सकता। अदालत ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी डॉ. हरिसिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी (सागर) के मामले में सुनवाई के दौरान की। जस्टिस विवेक अग्रवाल की सिंगल बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए भर्ती प्रक्रिया और चयन समिति के निर्णय को पूरी तरह वैध ठहराया है।

क्या था पूरा मामला और याचिकाकर्ता की दलील?

सागर स्थित डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में असिस्टेंट लाइब्रेरियन के पद के लिए चयन प्रक्रिया पूरी की गई थी। इस पद के लिए डॉ. कृष्णा कुमार केसहरवानी, जो विश्वविद्यालय में असिस्टेंट लाइब्रेरियन के रूप में कार्यरत थे, ने भी आवेदन किया था और चयन प्रक्रिया में भाग लिया था। चयन प्रक्रिया में असफल होने के बाद केसहरवानी ने हाईकोर्ट का रुख किया था। उनकी मुख्य दलील थी कि असिस्टेंट लाइब्रेरियन का पद सीधी भर्ती के बजाय प्रमोशन के माध्यम से भरा जाना चाहिए था। इसके अलावा उन्होंने चयनित उम्मीदवार डॉ. अनुराग श्रीवास्तव की योग्यताओं और अनुभव पर भी सवाल उठाए थे, जिसमें पीएचडी की तारीख और कार्य अनुभव से जुड़े मुद्दे शामिल थे।याचिकाकर्ता ने पद को सीधी भर्ती के बजाय प्रमोशन से भरने की मांग की थी।

चयनित उम्मीदवार डॉ. अनुराग श्रीवास्तव की योग्यता पर उठाए गए थे सवाल।

कोर्ट ने माना कि प्रक्रिया में शामिल होने के बाद याचिकाकर्ता अब नियमों को चुनौती नहीं दे सकता।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का दिया हवाला

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने ऐतिहासिक फैसले (मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज बनाम डॉ. के. शिवसुब्रमण्यम) का हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई उम्मीदवार बिना किसी आपत्ति या विरोध के चयन प्रक्रिया में शामिल होता है, तो वह असफल होने के बाद यू-टर्न लेकर उसी प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकता। इस कानूनी सिद्धांत के आधार पर अदालत ने याचिकाकर्ता के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें भर्ती के तरीके पर सवाल उठाया गया था।योग्यता और अनुभव पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने डॉ. अनुराग श्रीवास्तव की शैक्षणिक योग्यता और अनुभव के दावों को भी सही पाया। कोर्ट ने पाया कि यद्यपि श्रीवास्तव की पीएचडी की औपचारिक अधिसूचना बाद में जारी हुई थी, लेकिन उनकी पीएचडी की डिग्री का नोटिफिकेशन 28 अप्रैल 2011 को आ चुका था, जो कि विज्ञापन जारी होने की तारीख से पहले का है। इसके अलावा, अदालत ने माना कि ‘वांछनीय योग्यताएं’, ‘आवश्यक योग्यताओं’ से ऊपर नहीं हो सकतीं।

अनुभव के मामले में अदालत ने पाया कि:

  • चयनित उम्मीदवार डॉ. अनुराग श्रीवास्तव के पास केंद्रीय विद्यालयों में लाइब्रेरियन के रूप में 2 साल और 7 महीने का अनुभव था।
  • इसके विपरीत, याचिकाकर्ता डॉ. कृष्णा कुमार केसहरवानी के पास एक साल से भी कम का प्रासंगिक पर्यवेक्षक अनुभव था।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि कैटलागर के रूप में किया गया काम लाइब्रेरी में आवश्यक पर्यवेक्षी अनुभव के रूप में नहीं गिना जा सकता।
  • शैक्षणिक अंकों की तुलना में भी याचिकाकर्ता, चयनित उम्मीदवार से बारहवीं, स्नातक, बी.लिब और एम.लिब परीक्षाओं में पीछे रहे थे।

चयन समिति के अधिकार क्षेत्र में दखल से इनकार

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर भी जोर दिया कि अदालतों का यह काम नहीं है कि वे हर उम्मीदवार का खुद मूल्यांकन करें या चयन समिति के स्थान पर खुद अपील अदालत की तरह बैठें। अदालत ने कहा कि सामान्यतः चयन समिति की सिफारिशों में तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसमें दुर्भावना या वैधानिक नियमों का गंभीर उल्लंघन साबित न हो। चूंकि याचिकाकर्ता ऐसा कोई भी बड़ा उल्लंघन या गड़बड़ी साबित करने में विफल रहे, इसलिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

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