शिकायत वापस लेने के लिए विभाग पर दबाव बनाने का आरोप, जिले के हजारों किसान अब भी पंजीयन से वंचित,
खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान अब खेतों में पककर तैयार हो चुकी है और जिले के कुछ क्षेत्रों में किसानों ने कटाई भी शुरू कर दी है। ऐसे समय में किसानों के सामने अपनी उपज को सरकारी समर्थन मूल्य पर बेचने के लिए पंजीयन नहीं हो पाने की समस्या खड़ी हो गई है। जिले में एक ओर जहां एक लाख से अधिक किसान धान विक्रय के लिए पंजीयन करा चुके हैं, वहीं सरकारी आंकड़ों के अनुसार अनुमानित 25 से 30 हजार किसान अब भी पंजीयन से वंचित बताए जा रहे हैं। पंजीयन की निर्धारित अंतिम तिथि समाप्त होने और पोर्टल बंद होने के कारण इन किसानों की चिंता बढ़ गई है। किसानों का कहना है कि यदि उनकी धान का पंजीयन नहीं हुआ तो उन्हें सरकारी समर्थन मूल्य का लाभ नहीं मिल पाएगा और मजबूरी में बिचौलियों को कम कीमत पर उपज बेचनी पड़ सकती है। इससे खेती में लगाया गया पैसा निकालना भी मुश्किल हो सकता है। अब किसान शासन से पंजीयन की तारीख बढ़ाने और छूटे हुए किसानों को एक और अवसर देने की मांग कर रहे हैं।
जिला मुख्यालय से लगे भटेरा, कुम्हारी और पाथरवाड़ा सहित अन्य क्षेत्रों में पंजीयन नहीं होने की समस्या सामने आ रही है। कुछ किसानों ने अपनी परेशानी विभाग तक पहुंचाने के बाद सीएम हेल्पलाइन नंबर 181 पर भी शिकायत दर्ज कराई है। हालांकि, किसानों ने आरोप लगाया है कि उनकी समस्या का समाधान करने के बजाय विभागीय अधिकारी-कर्मचारी शिकायत वापस लेने के लिए दबाव बना रहे हैं। पाथरवाड़ा निवासी किसान वासुदेव के अनुसार, धान का पंजीयन नहीं होने पर उन्होंने पहले संबंधित विभाग में अपनी समस्या रखी और फिर सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई। उनका आरोप है कि शिकायत के बाद भी पंजीयन कराने का रास्ता निकालने के बजाय उनसे शिकायत वापस लेने के लिए कहा जा रहा है। किसान का कहना है कि जब सरकारी व्यवस्था में शिकायत दर्ज कराकर समस्या के समाधान की उम्मीद की जाती है, तो संबंधित विभाग को किसानों की परेशानी दूर करने पर ध्यान देना चाहिए, न कि शिकायत वापस लेने के लिए दबाव बनाना चाहिए। किसान धनेन्द्र ने बताया कि उनके पास करीब दो से ढाई एकड़ जमीन है और धान की बुवाई से लेकर कटाई तक प्रति एकड़ लगभग 25 हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। खाद, बीज, मजदूरी और अन्य कृषि लागत के बाद यदि उपज सरकारी समर्थन मूल्य पर नहीं बिकती है, तो उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। वहीं किसान सुभाष लिल्हारे ने बताया कि उनके पास करीब 12 एकड़ जमीन है। पहले परिवार का खाता सम्मिलित था, लेकिन बाद में खाते अलग-अलग होने के कारण परिवार के कुछ सदस्यों का ही पंजीयन हो पाया, जबकि अलग हुए अन्य सदस्यों के नाम से पंजीयन नहीं हो सका। ऐसे में उनकी जमीन पर पैदा होने वाली पूरी धान को सरकारी समर्थन मूल्य पर बेच पाना मुश्किल हो सकता है। किसानों का कहना है कि पंजीयन की अंतिम तिथि समाप्त हो जाने के कारण उन्हें अपनी ही उपज बेचने के लिए परेशानी झेलनी पड़ रही है। उनका सवाल है कि जब फसल खेतों में तैयार है और किसान सरकारी खरीदी का लाभ लेना चाहते हैं, तो पंजीयन की प्रक्रिया से छूट गए किसानों को एक और अवसर क्यों नहीं दिया जा रहा है। किसानों ने शासन और जिले के जनप्रतिनिधियों से इस मामले में हस्तक्षेप कर पंजीयन की तिथि बढ़ाने की मांग की है, ताकि तकनीकी, खाते संबंधी या अन्य कारणों से पंजीयन नहीं करा पाए किसानों को राहत मिल सके। उनका कहना है कि खेती में पहले ही लागत लगातार बढ़ रही है और यदि उपज कम कीमत पर बेचनी पड़ी तो परिवार का आर्थिक बजट बिगड़ सकता है। दूसरी ओर, विभागीय अधिकारियों का कहना है कि निर्धारित तारीख समाप्त होने के कारण पंजीयन पोर्टल बंद हो गया है। ऐसे में अब किसानों की निगाहें शासन के निर्णय पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या पंजीयन से छूट गए हजारों किसानों को राहत देने के लिए सरकार तारीख बढ़ाएगी, या फिर उन्हें अपनी मेहनत से तैयार की गई धान बेचने के लिए कम कीमत स्वीकार करने की मजबूरी झेलनी पड़ेगी?








































