J-20, J-35, भारत के मुकाबले चीन के पास हुए 3 गुना लड़ाकू विमान, तेजस MK1A बनाने की सुस्त रफ्तार, चिंताजनक स्थिति

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China Vs Indian Air Force: ‘वर्ल्ड एयर फोर्सेज 2026’ डायरेक्टरी के मुताबिक भारत के लड़ाकू और स्ट्राइक विमानों की संख्या 700 (2024 के आंकड़ों के अनुसार) से घटकर 564 (2026 तक) रह जाने का अनुमान है। चीन ने जे-20 जैसे स्टील्थ लड़ाकू विमानों के प्रोडक्शन की स्पीड और तेज कर दी है। दूसरी तरफ तेजस एमके-1 को लेकर भी भारत संघर्ष कर रहा है।बीजिंग: चीन ने भारत के मुकाबले लड़ाकू विमानों की संख्या को और आगे तेजी से आगे बढ़ा दिया है। चीन काफी तेजी से लड़ाकू विमानों का प्रोडक्शन कर रहा है और उसकी ये रफ्तार भारतीय वायुसेना के मुकाबले सैन्य असंतुलन को और आगे बढ़ा रही है। हालांकि इसका मतलब ये नहीं है कि भारत चीन के साथ लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाने की रेस में उतरे लेकिन भारत के पास कम से कम उतने लड़ाकू विमान होने ही चाहिए जितने स्वीकृत हैं। भारतीय वायुसेना के पास कम से कम 42 स्क्वॉर्डर्न होने चाहिए जो घटकर 28 रह गये हैं।चीन बनाम भारत, लड़ाकू विमानों की संख्या

  • नये आंकड़ों से पता चलता है कि ये असमानता सिर्फ लड़ाकू विमानों की संख्या में ही नहीं है बल्कि दोनों देशों की विमान बनाने की क्षमता में भी है।
  • ‘फ्लाइटग्लोबल’ की ‘वर्ल्ड एयर फोर्सेज 2026’ डायरेक्टरी (1 अक्टूबर 2025 तक के आंकड़ों के मुताबिक) चीन के पास लगभग 1,814 लड़ाकू विमान हैं जबकि भारत के पास 600 हैं।
  • इसी डायरेक्टरी के अनुसार चीन के पास कुल सैन्य विमानों की संख्या 3,529 है जबकि भारत के पास 2,183 हैं।
  • इस तरह इस डायरेक्टरी के हिसाब से चीन की लड़ाकू विमान क्षमता भारत से लगभग तीन गुना ज्यादा है। हालांकि इन आंकड़ों से यह पता नहीं चलता कि कोई देश किसी विशेष युद्ध क्षेत्र में वास्तव में कितने विमान तैनात कर सकता है।

भारत के मुकाबले चीन के पास ज्यादा एडवांस लड़ाकू विमान

  • चीन के पास न सिर्फ भारत से ज्यादा सैन्य विमान हैं बल्कि उसके पास कहीं ज्यादा आधुनिक लड़ाकू विमान भी मौजूद हैं।
  • इसी डायरेक्टरी के मुताबिक भारत के लड़ाकू विमान बेड़े में 265 Su-30MKI, 124 जगुआर, 65 मिग-29, 44 मिराज 2000, 36 मिग-29K, 35 राफेल और 31 तेजस Mk1 लड़ाकू विमान शामिल हैं।
  • वहीं चीन के आधुनिक लड़ाकू विमानों के बेड़े में सैकड़ों J-10, J-16 और J-20 विमान शामिल हैं।
  • इनमें से J-16 और J-20 चीन की लंबी दूरी तक मार करने और ‘स्टेल्थ’ (रडार की पकड़ में न आने वाली) युद्ध क्षमताओं से लैस लड़ाकू विमान हैं।
  • हालांकि यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि अलग-अलग डायरेक्टरी में दिए गए आंकड़े हमेशा एक जैसे नहीं होते इसलिए इन संख्याओं का इस्तेमाल सीधे तौर पर तुलना करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन भारत के लिए ज्यादा बड़ी समस्या चीन के विमान उत्पादन की मौजूदा और अनुमानित दर है।

चीन की लड़ाकू विमानों को बनाने की क्षमता क्या है?

  • 2026 की शुरुआत में प्रकाशित ‘रॉयल ​​यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट’ (RUSI) के ‘डिफेंस बजट्स मॉनिटर 2026’ के मुताबिक 2025 के अंत तक चीन के J-20A और J-20S (दो सीटों वाले) विमानों का उत्पादन लगभग 120 विमान प्रति वर्ष तक पहुंच गया था।
  • इसी स्रोत के मुताबिक चीन को 2025 के अंत तक 450 J-16 लड़ाकू विमान बनाने की उम्मीद है जिसमें उत्पादन की दर लगभग 100 विमान प्रति वर्ष है।
  • RUSI के अनुमानों के मुताबिक अगर उत्पादन की दर 2025 के स्तर पर ही बनी रहती है तो 2030 तक चीन के पास 1,000 J-20 सीरीज के लड़ाकू विमान और 900 J-16 लड़ाकू विमान हो सकते हैं।
  • ध्यान दें कि ये केवल RUSI द्वारा दिए गए अनुमान हैं और वास्तविक आंकड़े अलग हो सकते हैं क्योंकि सभी डेटा हमेशा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होते हैं।

भारत के पास विमानों के उत्पादन की क्षमता कितनी है?

  • चीन के मुकाबले भारत की विमानों के उत्पादन की क्षमता काफी कम है।
  • तेजस Mk1A के उत्पादन की दर सालाना 24 विमान होने का अनुमान है जबकि इसका लक्ष्य सालाना 30 विमान बनाने का है।
  • इन्हीं आंकड़ों के मुताबिक भारतीय वायु सेना (IAF) की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को हर साल 36 से 40 लड़ाकू विमानों का उत्पादन करने की आवश्यकता है।
  • इस हिसाब से जहां तेजस Mk1A लड़ाकू विमानों के उत्पादन की दर जरूरत से कम है वहीं रूसी और इजरायली लड़ाकू विमानों के उत्पादन की दर तो और भी कम है।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ‘वर्ल्ड एयर फोर्सेज 2026’ डायरेक्टरी के मुताबिक भारत के लड़ाकू और स्ट्राइक विमानों की संख्या 700 (2024 के आंकड़ों के अनुसार) से घटकर 564 (2026 तक) रह जाने का अनुमान है। जाहिर है यह कमी पुराने विमानों के रिटायर होने की वजह से है लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि विमानों की जरूरत और उनके मौजूदा उत्पादन की दर के बीच कितना बड़ा अंतर है। इसके अलावा चिंताजनक बात ये भी है कि उत्पादन की ये दरें सिर्फ लड़ाकू विमानों से संबंधित हैं। हल्के हमले वाले विमानों (लाइट अटैक एयरक्राफ्ट) और ट्रेनर विमानों के उत्पादन की दर तो और भी कम है।

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