कान्ह नदी और इसमें मिलने वाले नालों का पानी शहर से बाहर निकलने के बाद उज्जैन में शिप्रा नदी को प्रदूषित कर रहा है। इसे लेकर इंदौर जिला प्रशासन ने सात अधिकारियों की जांच समिति बना दी है। प्रदूषण के स्रोत को पकड़ने के लिए यह समिति देखेगी कि इंदौर शहर के बाहर ग्रामीण क्षेत्र के नालों में कहां और कैसे गंदा पानी मिल रहा है।
इसके लिए कान्ह और अन्य नालों से अलग-अलग स्थानों पर पानी के नमूने लिए जाएंगे। इन नमूनों से पानी की गुणवत्ता की जांच की जाएगी। कलेक्टर मनीषसिंह ने इसके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-144 के तहत जांच के आदेश जारी किए हैं। नईदुनिया ने सोमवार के अंक में ही प्रदूषण के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। इसके बाद प्रशासन हरकत में आया।
जांच समिति में अपर कलेक्टर पवन जैन, प्रदूषण निवारण मंडल के विज्ञानी संजय जैन, उद्योग विभाग के महाप्रबंधक अजय चौहान, जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री मुकेश चतुर्वेदी, नगर निगम के सहायक यंत्री आरएस देवड़ा और जनपद पंचायत इंदौर व सांवेर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी शामिल हैं।
जांच समिति के अधिकारी इंदौर जिले की सीमा में बहने वाले नदी और नालों के किनारे भ्रमण करेंगे, जो आगे जाकर शिप्रा नदी में मिलते हैं। इसके बाद प्रदूषण के स्रोत पर रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। प्रशासन ने भी स्वीकार किया है कि उज्जैन जिले में त्रिवेणी में शिप्रा के जिस स्थान पर कान्ह नदी का पानी मिलता है, वहां कान्ह नदी का पानी पूरी तरह शुद्ध नहीं है। इसीलिए यह पता लगाया जाएगा कि उज्जैन में शिप्रा में मिलने से पहले ऐसे कौन से स्थान हैं जहां कान्ह नदी में दूषित पानी मिल रहा है।
कान्ह नदी में प्रदूषण फैलाने वाले कारखाने भी होंगे बंद
जांच के दौरान जिस औद्योगिक इकाई या कारखाने के गंदे पानी या अन्य अपशिष्ट से कान्ह नदी में प्रदूषण होना पाया गया तो उस उद्योग का मौका पंचनामा बनाया जाएगा। साथ ही उसे मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानकर बंद कर दिया जाएगा। इस संबंध में कलेक्टर ने जांच समिति के अध्यक्ष और अपर कलेक्टर जैन को धारा-144 के तहत अधिकार दिए हैं। प्रदूषण निवारण मंडल के अधिकारी से भी जरूरी कार्रवाई कराई जाएगी।
कलेक्टर ने आदेश में कहा है कि शिप्रा नदी में मिलने के कारण कान्ह नदी में प्रवाहित होने वाले जल की शुद्धता महत्वपूर्ण है, क्योंकि उज्जैन जिले में शिप्रा तट पर कई स्थानों पर पवित्र स्नान किए जाते हैं। पिछले कुछ सालों में इंदौर नगर निगम ने अमृत परियोजना और स्वयं की निधि से सीवरेज ट्रीटमेंट के लिए कई कार्य किए। कान्ह और सरस्वती नदी के किनारे बने लगभग सात विकेंद्रीकृत वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट प्लांट प्रारंभ किए गए।










































