(उमेश बागरेचा)
बालाघाट (पद्मेश न्यूज) । जिला पंचायत में कांग्रेस प्रत्याशी की अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर हुई जीत ने 29 जुलाई के दिन को बालाघाट जिले में कांग्रेस को एक नए रूप में स्थापित करने का रास्ता खोल दिया है । जिले में कांग्रेस की कमान पिछले कई वर्षो से जिन हाथों में भी रही हो उन्होंने सिर्फ अपना ही हित साधा है, संगठन को अस्त व्यस्त कर दिया है। स्थानीय निकाय तथा पंचायत चुनाव के दौरान संगठन की कोई सार्थक भूमिका नहीं रही । संगठन की कमान मुख्यालय से 500 कि मी दूर इंदौर से संचालित हो रही थी , जिसका प्रतिफल है, वारासिवनी नगर पालिका चुनाव में कांग्रेस का नाम लेवा न होना, नगरपालिका बालाघाट के चुनाव में कांग्रेस का फिसड्डी साबित होना, जनपद पंचायतों का नेतृत्व हाथ में आते आते फिसल जाना। कांग्रेसियों ने धन्यवाद देना चाहिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ जी को जिन्होंने जिला पंचायत के सदस्यों के साथ भोपाल में बैठक के दौरान स्थानीय विधायकों और प्रभारी की उपस्थिति में स्पष्ट निर्देश दिया था कि अध्यक्ष पद के लिए सदस्यों का जिसके पक्ष में बहुमत हो उसे प्रत्याशी बनाया जाये, लेकिन इस निर्देश का प्रभारी शुरू से ही मखौल उड़ाते रहे। स्पष्ट है कि पहले ही दिन से कांग्रेस के 14 सदस्यो में से 12 सदस्य सम्राट सरसवार के साथ थे, मात्र दो सदस्य श्रीमती केसर बिसेन के साथ थे। किंतु जिले में कुछ फूलछाप कांग्रेसी हैं जिनकी दुकान, भाजपा के जिले के दिग्गज नेता के भरोसे लगभग हर चुनाव में सज जाती है, उन्होंने जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में भी सजाने की अथक कोशिश की । उनकी इस कोशिश में साथ निभाया प्रभारी ने, साथ निभाया इंदौर में विराजे संगठन प्रमुख ने, साथ निभाया पूर्व विधायक ने और तो और साथ निभाया उस शख्स ने जिसने पिछले विधान सभा चुनाव में जिले के बाहर से आकर वारासिवनी में कांग्रेस का सूपड़ा साफ करवा दिया। यह तो किरनापुर विधायक एवं विधानसभा की पूर्व उपाध्यक्ष सुश्री हीना कावरे की सूझ बूझ और कमलनाथ जी के मार्गदर्शन में किया गया नेतृत्व था जिसने भाजपा के हाथों लगभग जा चुकी पंचायत की कमान को कांग्रेस की झोली में डाल दिया । थोड़ी भी चूक होती तो चुनाव के एक दिन पहले रात्रि में जैसे ही प्रभारी ने प्रत्याशी के रूप में श्रीमती केसर बिसेन के नाम की घोषणा की, अपने भाऊ पूरे जोश में कांग्रेसी तथा निर्दलीय सदस्यों को रिझाने रात भर मेहनत करते रहे। जैसे ही इस बात की भनक हीना कावरे को लगी, उन्होंने रात्री में ही ढाई बजे उन सदस्यों को अपने साथ लेकर गोंदिया जहां सम्राट बाकी सदस्यों के साथ रुके हुए थे पहुंच गई । यदि हीना कावरे अपना पूरा दमखम नहीं लगाती और प्रभारी के दबाव में जैसे बैहर विधायक और पूर्व विधायक आ गए थे, आ जाती तो निश्चय ही कांग्रेस की, जिला सरकार नहीं बन पाती । सम्राट ने भी अपनी पूरी ताकत सदस्यों को एक जुट रखने में झोंकी , उन्होंने भी मैदान में डंटे रहने का सदस्यों को आश्वासन दिया । उनके पास 11 वोट शुरू से थे । यदि बैहर क्षेत्र के दो तथा परसवाड़ा क्षेत्र के दो, ये चार कांग्रेसी वोट और मिल जाते तो सम्राट के 15 वोट हो जाते तथा इस परिस्थिति में उपाध्यक्ष आदिवासी दलसिंह पंद्रे ही बनते । कमलनाथ के निर्देश के अनुसार कांग्रेस के सभी जिला पंचायत सदस्यों तथा कांग्रेस को समर्थन दे रहे निर्दलीय सदस्यों से वन टू वन चर्चा करके, उनकी राय अनुसार प्रभारी द्वारा निर्णय लिया जाता तो कांग्रेस के अंदरखाने चल रही गुट बाजी दबी की दबी रह जाती ,किंतु प्रभारी द्वारा ऐसा नहीं किए जाने के कारण कांग्रेस की गुटबाजी खुलकर सामने तो आ ही गई है,साथ ही प्रभारी की इस हरकत ने जिला कांग्रेस में गुटबाजी की एक नई खाई खोद डाली है ।








































