नई दिल्ली: अनिल अंबानी ग्रुप और उसकी कंपनियों से जुड़े कथित बड़े पैमाने पर बैंकिंग धोखाधड़ी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि इसमें गहन जांच की आवश्यकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली ADAG कंपनियों के बैंक लोन से 30000 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी की CBI और ED जांच की निगरानी कर रहा है। ऐसे में वह किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी का आदेश देने से बहुत हिचकेगा। याचिकाकर्ता IAS अधिकारी (रिटायर्ड) E.A.S. सरमा ने वकील प्रशांत भूषण के ज़रिए कोर्ट में अहम टिप्पणी की है।
रिटायर्ड आईएएस अधिकारी सरमा ने वकील प्रशांत भूषण के जरिए सुप्रीम कोर्ट में कहा कि भले ही बैंक लोन धोखाधड़ी घोटाले के मामलों में से एक में सीबीआई की चार्जशीट में अनिल अंबानी, उनके बेटे जय अनमोल अंबानी और Yes Bank के राणा कपूर का नाम है। लेकिन जांच एजेंसियां सिर्फ ADAG अधिकारियों को गिरफ्तार कर रही हैं। ‘सरगना’ को हाथ भी नहीं लगा रही हैं। जैसे कि वह कोई ‘पवित्र गाय’ हो।सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में कह दी बड़ी बात
याचिकाकर्ता की ओर से कही गई बात पर मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि वह किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी का निर्देश देने से बहुत हिचकेगा। इसके साथ ही सबूत इकट्ठा करने और उन्हें सुरक्षित रखने, गवाहों को सुरक्षा देने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जांच की निगरानी करते समय, हम किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी या अरेस्ट नहीं होने के सही या गलत होने पर कोई राय जाहिर नहीं करते। प्रभावी जांच के लिए, एजेंसियां ही सबसे बेहतर स्थिति में होती हैं कि वे तय कर सकें कि आगे कैसे बढ़ना है।
‘बेंच ने ADAG की उस अर्जी को ठुकराया जिसमें…’
बेंच ने ADAG की उस अर्जी को ठुकरा दिया जिसमें ऑर्डर में एक लाइन जोड़ने की मांग की गई थी, ताकि यह मैसेज दिया जा सके कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले की खूबियों पर कोई राय नहीं बनाई है। जांच की निगरानी करने का मतलब इसके विपरीत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1990 के दशक में विनीत नारायण मामले में जैन-हवाला घोटाले की CBI जांच की निगरानी के दौरान विकसित किया गया ‘कंटीन्यूअस मैंडमस’ (लगातार निर्देश जारी करने का अधिकार) का सिद्धांत एक ऐसा सिद्धांत है जिस पर कोर्ट को गर्व होना चाहिए।










































