जिला अस्पताल का हाई रिस्क दावा निकला खोखला,निजी अस्पताल भेजी गई प्रसूता का जिला अस्पताल में ही हुआ सुरक्षित ऑपरेशन, विधायक के हस्तक्षेप से खुली रेफरल व्यवस्था की पोल ,

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जिला चिकित्सालय बालाघाट में मरीजों और विशेषकर प्रसूताओं को निजी अस्पतालों के लिए रेफर किए जाने के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इन आरोपों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जिस प्रसूता को चिकित्सकों ने हाई रिस्क बताकर जिला अस्पताल में ऑपरेशन करने से इनकार कर निजी अस्पताल भेज दिया था, उसी महिला का अगले ही दिन जिला चिकित्सालय में सफल सीजेरियन कर सुरक्षित प्रसव करा दिया गया। प्रसूता ने स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया और जच्चा-बच्चा दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं। इस घटनाक्रम ने जिला अस्पताल की कार्यप्रणाली, चिकित्सकीय निर्णयों और रेफरल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला सिवनी जिले के कुरई थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम रामपुरी निवासी प्रीति गहरवाल का है, जिन्हें 30 जुलाई को प्रसव पीड़ा होने पर जिला चिकित्सालय बालाघाट में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि भर्ती के बाद कई घंटों तक न तो चिकित्सकों ने समुचित परीक्षण किया और न ही आवश्यक उपचार शुरू किया गया। काफी इंतजार के बाद जब प्रसूता को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया, तब एनेस्थीसिया डॉ. अश्विनी भौतेकर ने मरीज को हाई रिस्क बताते हुए जिला अस्पताल में ऑपरेशन करने से इनकार कर दिया और निजी अस्पताल रेफर कर दिया। डॉक्टरों द्वारा संभावित खतरे की बात कहे जाने से परिजन घबरा गए और प्रसूता को निजी अस्पताल ले गए। इसी दौरान पूरे मामले की जानकारी बालाघाट विधायक अनुभा मुंजारे तक पहुंची। विधायक ने तत्काल हस्तक्षेप करते हुए निजी अस्पताल से प्रसूता को वापस जिला चिकित्सालय बुलवाया और सिविल सर्जन के समक्ष पूरे मामले की जानकारी ली। करीब डेढ़ घंटे तक चली चर्चा में विधायक ने रेफर करने वाले चिकित्सकों से पूछा कि आखिर ऐसी कौन-सी स्थिति थी, जिसके कारण जिला अस्पताल में ऑपरेशन संभव नहीं था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि जिला अस्पताल में विशेषज्ञ और संसाधन उपलब्ध हैं तो मरीजों को बिना ठोस कारण निजी अस्पताल भेजना उचित नहीं है। विधायक के हस्तक्षेप और परिजनों की सहमति के बाद जिला चिकित्सालय में ही प्रसूता का सीजेरियन किया गया। 31 जुलाई को शाम 5:11 बजे प्रीति गहरवाल ने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया। प्रसव पूरी तरह सफल रहा और जच्चा-बच्चा दोनों सुरक्षित हैं। इस घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि यदि जिला अस्पताल में सुरक्षित ऑपरेशन संभव था, तो एक दिन पहले मरीज को “हाई रिस्क” बताकर निजी अस्पताल क्यों भेजा गया? प्रसूता प्रीति गहरवाल ने बताया कि एक दिन पहले उन्हें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि उनकी स्थिति अत्यंत गंभीर है और ऑपरेशन के दौरान मां या बच्चे की जान को खतरा हो सकता है। इसी आधार पर उन्हें निजी अस्पताल जाने की सलाह दी गई थी। लेकिन जब जिला अस्पताल में ही सफल ऑपरेशन हो गया और स्वस्थ बच्ची का जन्म हुआ तो उन्हें भी समझ नहीं आया कि आखिर पहले उन्हें इतना भयभीत क्यों किया गया। इस पूरे घटनाक्रम के बाद जिला चिकित्सालय में वर्षों से उठ रहे उन आरोपों को भी बल मिला है, जिनमें कहा जाता रहा है कि कुछ चिकित्सक मरीजों को विभिन्न चिकित्सकीय कारणों का हवाला देकर निजी अस्पतालों की ओर रेफर करते हैं। कई मरीजों और परिजनों का आरोप रहा है कि कभी हाई ब्लड प्रेशर, कभी ब्लड की कमी, तो कभी हाई रिस्क जैसी स्थितियां बताकर उन्हें निजी नर्सिंग होम जाने के लिए मजबूर किया जाता है। हालांकि चिकित्सकों का पक्ष यह रहता है कि मरीज की चिकित्सकीय स्थिति को देखते हुए ही रेफर किया जाता है, लेकिन प्रीति गहरवाल के मामले ने इन दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग के जानकारों का कहना है कि यदि जिला अस्पताल में उपलब्ध संसाधनों और विशेषज्ञों के बीच सफल ऑपरेशन संभव था, तो प्रारंभिक स्तर पर मरीज और परिजनों की बेहतर काउंसलिंग कर उपचार किया जाना चाहिए था। अनावश्यक रेफरल न केवल मरीज और परिजनों पर आर्थिक बोझ बढ़ाता है, बल्कि गंभीर स्थिति में समय की भी हानि करता है। फिलहाल स्वस्थ बच्ची के जन्म से परिवार में खुशी का माहौल है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने जिला चिकित्सालय की रेफरल व्यवस्था, चिकित्सकीय निर्णय प्रक्रिया और मरीजों के प्रति व्यवहार को लेकर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अब लोगों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले की जांच कर जिम्मेदारी तय करता है या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

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