नई दिल्ली: ‘मैं आज खुश हूं, लेकिन अगर धर्मेंद्र प्रधान ने पहले ही जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया होता तो इतना बड़ा विवाद शायद नहीं होता। बच्चे शायद हालात को पहले ही समझ जाते और मेरी बेटी आज हमारे साथ होती। कोई भी मुआवजा बेटी की जगह नहीं ले सकता। मैं 1 करोड़ रुपये दूंगा। आप मेरी बेटी को मेरे पास वापस ले आइए।’ बेटी के पिता राजेश ने एक टीवी इंटरव्यू में यह बात जब कही तो यकीन मानिए उन्हें सुनने-देखने वालों का कलेजा भी दुख से फट गया होगा। बच्चे बुढ़ापे की सिर्फ लाठी नहीं होते, वे घर चिराग होते हैं, देश की उम्मीद होते हैं।
जिन बच्चों ने NEET पेपर लीक की वजह से मौत को गले लगाया वे अगर होते तो जिस तरह से मीराबाई चानू के कॉमनवेल्थ गेम्स-2026 में गोल्ड जीतने पर दोनों सदनों में तालियां बजीं, ठीक उसी तरह उनकी सफलता पर देश गर्व करता, लेकिन आज जब वे नहीं हैं तो किसी मां की गोद सूनी हो गई है तो किसी पिता का सहारा छिन गया। जिन आंखों में कभी उम्मीदों की चमक थी, वो आंखें पथरा गईं हैं। कभी नहीं खत्म होने वाले दुख का बोझ आखिर कब तक और कैसे झेला जाएगा, जवान बच्चे के शव को कंधा देते वक्त आखिर वो हिम्मत कहां से आई होगी?









































