सीमा पार का खेल या कानून से बचने की चाल ? महाराष्ट्र का कारोबारी, मध्यप्रदेश का गांव और चुपचाप चल रही गुड़ाखू फैक्ट्री

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तंबाकू की तीखी गंध, गुड़ की राब से तैयार हो रहा गुड़ाखू, बिना सुरक्षा घंटों काम कर रहे मजदूर…..आखिर किसकी निगरानी में चल रहा यह कारोबार?
लांजी। महाराष्ट्र की सीमा से महज कुछ किलोमीटर दूर मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले की लांजी तहसील का छोटा सा ग्राम कुल्पा इन दिनों एक ऐसे कारोबार का गवाह बना हुआ है, जिसकी भनक तक जिम्मेदार विभागों को नहीं लगने की चर्चा है। गांव के बीचों-बीच संचालित एक गुड़ाखू निर्माण इकाई में दिनभर तंबाकू और गुड़ की राब का मिश्रण तैयार होता है, डिब्बियों पर ‘शिवनाथ गुड़ाखूÓ के लेबल चिपकाए जाते हैं और यह पूरा काम ऐसे चलता है मानो किसी सरकारी नियम-कायदे का यहां कोई अस्तित्व ही न हो। सबसे हैरानी की बात यह है कि ग्रामीणों के अनुसार इस इकाई का संचालन महाराष्ट्र के गोंदिया जिले का एक कारोबारी कर रहा है। सवाल यह नहीं कि कारोबार कौन कर रहा है, बल्कि यह है कि यदि सब कुछ वैध है तो स्थानीय पंचायत, संबंधित विभागों और अन्य सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष इसकी वैधानिक अनुमति और लाइसेंस क्यों दिखाई नहीं दे रहे? फैक्ट्री के भीतर काम कर रहे मजदूरों की हालत और भी चिंताजनक दिखाई देती है। कोई मास्क नहीं, हाथों में दस्ताने नहीं, आंखों पर सुरक्षा चश्मा नहीं। तंबाकू की धूल और निकोटीन के बीच घंटों काम करना उनकी मजबूरी बन चुका है। शायद उन्हें यह मालूम भी नहीं कि लगातार निकोटीन के संपर्क में रहने से त्वचा, फेफड़ों और शरीर पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। पेट की आग बुझाने निकले ये मजदूर अनजाने में अपने स्वास्थ्य को दांव पर लगा रहे हैं।
नियमों की सूची लंबी, पालन कहीं दिखाई नहीं दिया….
गुड़ाखू जैसी तंबाकू उत्पाद निर्माण इकाई के संचालन के लिए तंबाकू निर्माण संबंधी वैधानिक अनुमति, फैक्ट्री पंजीयन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्वीकृति, स्थानीय निकाय की अनुमति, अग्निशमन सुरक्षा प्रमाणपत्र सहित कई कानूनी प्रक्रियाएं आवश्यक होती हैं। जबकि इस संबंध में ग्राम पंचायत कुल्पा से ऐसी कोई अनुमति जारी नहीं की गई है। फैक्ट्री स्थल पर कर्मचारियों द्वारा तैयार डिब्बियों पर ‘शिवनाथ गुड़ाखू’ के लेबल लगाए जाते दिखाई दिए। अब यह जांच का विषय है कि इस ब्रांड का अधिकृत निर्माता कौन है, इसका ट्रेडमार्क किसके नाम पंजीकृत है और ग्राम कुल्पा स्थित इकाई को इस ब्रांड के निर्माण अथवा पैकेजिंग की वैधानिक अनुमति प्राप्त है या नहीं। वहीं इस मामले में यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है कि महाराष्ट्र की सीमा से सटे इस गांव को ही निर्माण इकाई के लिए क्यों चुना गया। क्या यह केवल व्यावसायिक सुविधा है या इसके पीछे कोई और कारण है? इसका उत्तर केवल सक्षम विभागों की जांच ही दे सकती है।
बिना नाम-पते की फैक्ट्री, पहचान सिर्फ ‘गुड़ाखू फैक्ट्री’
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस भवन में यह फैक्ट्री संचालित हो रही है, उसके बाहर कहीं भी फैक्ट्री का नाम, पंजीयन क्रमांक, कंपनी का बोर्ड, लाइसेंस संबंधी जानकारी अथवा किसी प्रकार का संकेतक अंकित नहीं मिला। दूर से देखने पर यह एक सामान्य भवन जैसा दिखाई देता है, जिससे किसी बाहरी व्यक्ति के लिए यह समझ पाना मुश्किल है कि भीतर तंबाकू उत्पाद का निर्माण किया जा रहा है। क्षेत्र के लोग भी इस इकाई को किसी कंपनी के नाम से नहीं, बल्कि केवल ‘गुड़ाखू फैक्ट्रीÓ के नाम से जानते हैं। यदि यह इकाई पूरी तरह वैध रूप से संचालित हो रही है, तो फिर इसकी पहचान सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित क्यों नहीं की गई? भवन पर नाम, पंजीयन या लाइसेंस संबंधी जानकारी का अभाव जांच का एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है, जिसकी पुष्टि संबंधित विभागों को मौके पर पहुंचकर करनी चाहिए।
इनका कहना है….
हमारे द्वारा उक्त फैक्ट्री के संचालन के लिये किसी प्रकार की कोई एनओसी नहीं दी गई है और न ही फैक्ट्री संचालक द्वारा हमसे कोई संपर्क किया गया है। इस संबंध में मेरे द्वारा जानकारी लेने के लिये अपने प्रतिनिधी को भेजा गया था परंतु उन्हें भी फैक्ट्री के कर्मचारियों ने कोई जानकारी नहीं दी।
श्रीमती सुनैना जतिन नगपुरे
सरपंच, ग्राम पंचायत कुल्पा
इस संबंध में आपको द्वारा अवगत कराया गया है, क्षेत्र में अगर इस तरह कोई बिना प्रशासनिक अनुमति के फैक्ट्री का संचालन कर रहा है तो उन्हें इस संबंध में प्रशासन को अवगत कराना चाहिए था। जांच टीम भेजकर जांच कराई जाएगी और फैक्ट्री का संचालन अगर नियम विरूद्ध होगा तो नियमानुसार कार्यवाही की जाएगी।
कमलचंद सिंहसार,
एसडीएम लांजी

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