पुरूष प्रधान देश में अधिकारो से कोसो दूर महिलाऐं

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पद्मेश न्यूज। वारासिवनी। यह कैसा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस जहां आज भी महिलाओं को अपने अधिकारो और हक के लिये जूझना पड़ रहा है। अन्र्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर नगर में महिलाओं से संबंधित किसी प्रकार का शासकीय कार्यक्रम का आयोजन ना होना इस बात को प्रमाणित करता है कि आज भी महिलाओं को अपना अधिकार पाने की लंबी जद्दोजहद करनी होगी। पूरे विश्व में ८ मार्च को अन्र्तराष्ट्रीय महिला दिवस बड़े जोश खरोश से मनाया जाता है और विभिन्न शासकीय कार्यक्रमो का आयोजन कर महिलाओं के सशक्त रूप को बताया जाता है और ऐसे कार्यक्रमो में महिलाओं से जुड़ी विभिन्न शासकीय जनकल्याणकारी योजनाओं का बखान किया जाता है। इन योजनाओं से लाभांवित महिलाओं के सरकारी आकड़े बताये जाते है ताकि महिलाओं को उनसे संबंधित योजनाओं और मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी प्राप्त हो सके। मगर अन्र्तराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर नगर में ना तो महिला बाल विकास ने किसी प्रकार का कोई कार्यक्रम आयोजित किया और ना ही अन्य शासकीय विभागो ने।

मॉ दुर्गा की शक्ति दिखा रही कुछ महिलाओं की मेहनत

अगर हम आज महिलाओं के रूप का दूसरा पहलू देखे तो महिलाओं को आज भी अपना अधिकार पाने के लिये दर दर की ठोकरे खानी पड़ रही है फि र भी उन्हे अपने अधिकारों से वंचित रहना पड़ रहा है। जिसका एक उदाहरण नगर में देखा जा सकता है जहां कुछ महिलाऐं ऐसी है जो बगैर किसी शासकीय योजना का लाभ लिये बगैर शान से अपना छोटा मोटा व्यवसाय कर अपने साथ साथ पूरे परिवार का पेट पाल रही है और लोगो को जीवन जीने की कला सीखा रही है। जिनकी हाडतोड़ मेहनत देखकर बर्बस ही उन पर नजर टिक जाती है और ऐसा लगता है कि साक्षात मॉ दुर्गा उनमे समाहित हो चुकी है जो नारी शक्ति का अहसास करा रहीं है।

नही जानती क्या है अधिकार

वहीं कुछ महिलाऐं ऐसी है जो विक्षिप्त है जिनकी ना तो शासन सुध ले रहा है और ना ही उनके परिजन जिन्हे यहां तक नही पता की आज अन्र्तराष्ट्रीय महिला दिवस क्या होता है। इसी तरह कुछ महिलाऐं ऐसी है जो भीख मांगकर अपने परिवार का पेट पाल रही है फि र हम यह कैसे माने की २१ वीं सदी में पहुॅचने के बाद भी महिलाओं को भारत रूपी पुरूष प्रधान देश में बराबरी का दर्जा प्राप्त हो चुका है और शासन जो महिलाओं के हित में योजनाऐं लागू कर चला रहा है उनका पूरा फ ायदा महिलाओं को मिलने लगा है।

सरकारी आकड़ो में ही महिला सशक्त

सिर्फ सरकारी कागजी आंकड़े पर ही महिलाओं का सशक्त रूप दिखाई देता है जो यथार्थ के धरातल पर शून्य है। आज भी भारत देश की अधिकांशता आबादी ग्रामो में निवास करती है,जहां शिक्षा का स्तर इतना ऊंचा नही है जिसकी वजह से ना तो उन्हे शासन के द्वारा उनके हित में चलाई जा रही योजनाओं का लाभ मिल पाता है और ना ही सरकारी मिशनरी उन्हे लाभ दिलवाये जाने के लिये युध्द स्तर पर प्रयास करती है। जिसकी वजह से ही आज भी महिलाओं को अपना अधिकार और हक पाने जूझना पड़ रहा है।

उच्च वर्ग की अधिकांशता महिलाऐं ही जानती है अपने अधिकार

राजनिति का क्षेत्र हो या फिर शासकीय नौकरियों का या फि र सामाजिक क्षेत्र इन सभी क्षेत्रो में अगर हम नजर दौड़ायें तो यह बात सामने आती है कि जो महिलाऐं शिक्षित व उच्च वर्ग से ताल्लुक रखती है वे ही आज समाज की मुख्यधारा से जुड़ी हुई है। जो तटस्थ होकर अपने अधिकारो को जानती और पहचानती है इसलिये वें आज समाज में एक मिशाल के रूप में देखी जाती है। पदमेश न्यूज की टीम ने ऐसी ही कुछ महिलाओं की तलाश की जो निम्र वर्ग से ताल्लुक रखती है जो बगैर किसी शासकीय योजना का लाभ उठाये अपने परिवार को बेहतर शिक्षा व सुख सुविधा देने के लिये मेहनत कर समाज में एक उदाहरण पेश कर रही है।

महिला सशक्तिकरण धरातल पर नहीं है कोई महिला सशक्त नहीं हुई है-छाया पंचेश्वर

पद्मेश से चर्चा में रेजा संघ अध्यक्ष छाया पंचेश्वर ने बताया कि कृषि उपज मंडी में हम धान भराई का काम करते हैं। १० वर्षों से मैं काम कर रही हूं आज तक हमें कोई लाभ नहीं मिला है ३ रूपये २० पैसे प्रति क्विंटल मिलती है। बात अधिकार और सुविधा की करें तो मंडी में महिला प्रसाधन तक ठीक से नहीं है खुले में जाकर शर्मिंदा होना पड़ता है। एक सप्ताह में २५० रुपए यानी रोजाना १० रुपए मिलते हैं मेरे घर में कमाने वाला कोई नहीं है। बेटा छोटा है स्कूल पढ़ रहा है ६८ वर्ष की सास है मैं काम करती हूं मुझे और मेरे बच्चे को कोई योजना का लाभ नहीं है। मजदूर कार्ड है उसका भी हमें कोई फ ायदा नहीं है हमारे बच्चे को स्कॉलर और हमें काम करने के लिए लोन मिलना था तो घर ठीक चलता। परंतु अभी इतने में जितना होता है उतना कर रहे हैं महिला सशक्तिकरण धरातल पर नहीं है कोई महिला सशक्त नहीं हुई है। यहां हमारे साथ जो भी महिलाएं करती है सभी की स्थिति हमारे जैसी है।

आज तक कोई हमें जागरुक करने भी नहीं आया-रेखा जमरे

पद्मेश से चर्चा में रेखा जमरे ने बताया की २० वर्ष से मैं काम कर रही हूं मेरा मायका नागपुर का ससुराल वारासिवनी का हैं। हमारे घर में आर्थिक स्थिति खराब होने से मुझे यह काम करना पड़ रहा है,पहले यहां मेरी सास ने करीब ५० वर्ष काम किया अब उनके बाद मैं २० वर्षो से काम कर रही हूं। रोजी का कोई निश्चित नहीं है क्विंटल पीछे रुपए मिलते हैं इससे हमारा काम नहीं चलता है। सुबह दूसरा काम करती हूं और दोपहर १ बजे से यहां काम करती हूं तब जाकर परिवार चलता है। यहां मंडी में बराबर रोजगार तो मिलता नहीं है परंतु लाभ भी कुछ नहीं मिल रहा है मजदूर पंजीयन का भी हमारा कोई लाभ नहीं है। दूसरी कक्षा तक पढ़ी हूं शिक्षा का अभाव रहा है आज तक कोई हमें जागरुक करने भी नहीं आया। पहले हमारे बच्चों को मेघावी छात्रवृत्ति मिलती थी वह भी अब बंद हो गई है।

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