भिंडी, मेथी और चावल से बनाया वॉटर फिल्टर, कीमत मात्र ₹100, दो बहनों ने दी 19000 करोड़ की इंडस्ट्री को टक्कर

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नई दिल्ली: अगर आप वॉटर फिल्टर खरीदने में हजारों रुपये खर्च करने से बचना चाहते हैं तो यह काम मात्र 100 रुपये में हो सकता है। दो जुड़वां बहनों ने भिंडी , मेथी और चावल का इस्तेमाल कर ऐसा वॉटर फिल्टर बनाया है जो लोगों की गंदे पानी समस्या दूर कर सकता है और उन्हें पीने के लिए साफ पानी मिल सकता है। इन दो बहनों के नाम नैना सिंह और नयनतारा सिंह है। सबसे खास बात है कि इसके लिए किसी भी प्रकार की बिजली की जरूरत नहीं है।

ये दोनों बहनें नोएडा के एक प्राइवेट स्कूल की कक्षा 12वीं छात्राएं हैं। अपने इस अनोखे वॉटर फिल्टरेशन सिस्टम के लिए नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर कई पुरस्कार जीते हैं। इस फिल्टरेशन की सबसे खास बात है कि यह पानी से माइक्रोप्लास्टिक्स और खतरनाक पीएफएएस (PFAS) को पूरी तरह साफ कर सकता है। ये ऐसे खतरनाक रसायन हैं जो सालों तक पर्यावरण और इंसानी शरीर में बने रहते हैं। PFAS को ‘फॉरएवर केमिकल्स’ भी कहा जाता है।अरबों की इंडस्ट्री को टक्कर

दोनों बहनों के इस वॉटर फिल्टरेशन सिस्टम ने देश करीब 19000 करोड़ रुपये की वॉटर प्यूरीफाई इंडस्ट्री को टक्कर दी है। यह सालाना 16 से 18 फीसदी की दर से बढ़ रही है। इसमें एक्वागार्ड, केंट, लिवप्योर, ब्लू स्टार, एओ स्मिथ जैसी कंपनियां भारत में प्रमुख रूप से शामिल हैं।कैसे शुरू हुआ सफर?

दोनों बहनों को यह प्रेरणा दिल्ली सरकार के एक अध्ययन से मिली, जिसमें दिल्ली के सभी जिलों में ग्राउंड वॉटर के लेवल में भारी गिरावट और प्रदूषण की बात कही गई थी। इसके बाद दोनों ने कक्षा 11वीं से इस पर रिसर्च शुरू की, जो आगे चलकर एक साल लंबे प्रोजेक्ट में बदल गई।

न बिजली जरूरी और न मेंटेनेंस

  • दोनों बहनों ने अपने स्टूडेंट स्टार्टअप हाइड्रा नोवा (Hydra Nova) के तहत Aqua Sattva (एक्वा सत्वा) नाम का एक प्लांट-बेस्ड फिल्टरेशन सिस्टम विकसित किया है।
  • इस तकनीक में भिंडी और मेथी से बने पॉलीमर और चावल के छिलके की बायोचार का इस्तेमाल किया गया है। इस मिश्रण को छोटे-छोटे पाउच में पैक किया जाता है, जो दिखने में बिल्कुल टी-बैग जैसे होते हैं।
  • महंगे वॉटर प्यूरीफायर (RO) के उलट इस देसी फिल्टर को काम करने के लिए बिजली, प्लंबिंग, मेंटेनेंस या किसी तकनीकी जानकारी की जरूरत नहीं होती।
  • ये पाउच पूरी तरह से इको-फ्रेंडली और बायोडिग्रेडेबल हैं क्योंकि इन्हें कृषि अवशेषों और पौधों से बनाया गया है।

सस्ता और बेहतर विकल्प

बाजार में मिलने वाले पारंपरिक आरओ (RO) सिस्टम की कीमत 10,000 से 30,000 रुपये के बीच होती है। ये बहुत सारा पानी भी बर्बाद करते हैं और उनके लिए बिजली की जरूरत होती है।

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