इस्लामाबाद/नई दिल्ली: सिंधु जल संधि पर भारत ने द हेग स्थित इंटरनेशनल कोर्ट के फैसले को ठुकरा दिया है। जिसके बाद पाकिस्तान विकल्पहीन हो चुका है। सिंधु जल संधि पर 1960 में दस्तखत किए गये थे और करीब 60 वर्षों तक ये संधि कायम रहा। लेकिन पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को सस्पेंड कर दिया। हाल ही में द हेग स्थित ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ ने भारत के इस कदम को समझौते के तहत अनुचित ठहराया जिसे नई दिल्ली ने सिरे से खारिज कर दिया है।
इस बीच संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में एक भारतीय NGO ने इस जल संधि की समीक्षा की मांग उठाने से इस्लामाबाद की चिंताएं और गहरा गई हैं। एक भारतीय NGO ने सिंधु जल संधि (IWT) की समीक्षा की मांग की है। उनका तर्क है कि इलाके में पानी की सुरक्षा से जुड़ी बदलती स्थितियों को देखते हुए 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते पर आज के दौर में मानवाधिकारों के नजरिए से फिर से विचार करने की जरूरत है।
सिंधु जल संधि का मामला UNHRC पहुंचा
सुरक्षित पीने के पानी और साफ-सफाई के मानवाधिकारों पर स्पेशल रैपोर्टेयर के साथ बातचीत के तहत UN मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63वें सत्र में आइटम 3 पर मौखिक बयान देते हुए दिल्ली स्थित NGO ने कहा कि पानी तक पहुंच का सीधा संबंध जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, आवास, सम्मान और विकास के अधिकारों से है।
सुरक्षित और साफ पीने के पानी और साफ-सफाई तक पहुंच को UN द्वारा एक बुनियादी मानवाधिकार के तौर पर मान्यता दिए जाने का जिक्र करते हुए बयान में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय जल संधियों को इस तरह से लागू किया जाना चाहिए कि वे देशों की मानवाधिकारों से जुड़ी जिम्मेदारियों को पूरा करने की क्षमता को मजबूत करें न कि उसमें रुकावट डालें।





































