MP Sthapana Diwas: संघ की पैठ, 337 विधायकों वाली पहली विधानसभा और हिंदुत्व की प्रयोगशाला; ऐसा रहा है मध्य प्रदेश का सियासी सफर

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MP Sthapana Diwas:मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस के अवसर पर याद करते हैं साल 1956 के उस 1 नवंबर को, जब 337 सदस्यों के साथ प्रदेश की पहली एकीकृत विधानसभा का गठन हुआ था। मध्य प्रदेश, मध्य भारत, विन्ध्य प्रदेश और भोपाल के विलय से बने इस राज्य का राजनीतिक ताना-बाना शुरू से ही दिलचस्प रहा है।भोपाल: मध्य प्रदेश आज अपना स्थापना दिवस मना रहा है। एक नवंबर 1956 का वह दिन भारतीय इतिहास और राज्य के राजनीतिक भूगोल में एक मील का पत्थर साबित हुआ था, जब देश के हृदय प्रदेश यानी ‘मध्य प्रदेश’ का एक एकीकृत स्वरूप सामने आया था। इस खास मौके पर आइए जानते हैं कि कैसे चार अलग-अलग प्रांतों के मिलने से यह राज्य बना और शुरुआती दौर में यहां की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां कैसी थीं।

चार प्रांतों के विलय से हुआ था गठन

आजादी के बाद और भाषाई राज्यों के पुनर्गठन के दौर में 1 नवंबर 1956 को 337 सदस्यों के साथ मध्य प्रदेश की पहली ‘एकीकृत’ विधानसभा का गठन किया गया था। इससे पहले यह पूरा भौगोलिक इलाका चार अलग-अलग प्रांतों में बंटा हुआ था। इनमें महाकौशल/मध्य प्रदेश, मध्य भारत, विन्ध्य प्रदेश और भोपाल। इन सभी रियासतों और क्षेत्रों के विलय के बाद एक बड़े राज्य के रूप में आधुनिक मध्य प्रदेश अस्तित्व में आया।सबसे बड़ा राजनीतिक दल थी कांग्रेस

चुनाव आयोग के उस दौर के आंकड़ों पर नजर डालें तो पहली अंतरिम विधानसभा में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ा राजनीतिक दल थी, जिसके पास 258 विधायक थे। इसके बाद मुख्य विपक्षी दल के रूप में सोशलिस्ट पार्टी थी जिसके 16 विधायक सदन में पहुंचे थे। हालांकि, इस सदन की सबसे खास और अनोखी बात यह थी कि इसमें हिंदू महासभा के 12 और भारतीय जनसंघ के 6 विधायक भी शामिल थे, जो इस बात का संकेत था कि इस क्षेत्र में दक्षिणपंथी और वैचारिक संगठनों की जड़ें शुरुआती दौर से ही मजबूत होना शुरू हो गई थीं।हिंदुत्व की प्रयोगशाला रहा है मध्य प्रदेश

वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नागपुर यानी कि संघ मुख्यालय से भौगोलिक निकटता के कारण मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में संघ और उससे जुड़े संगठनों ने आजादी से पहले ही अपनी सक्रियता बढ़ा दी थी। खासतौर पर मालवा, ग्वालियर, भिंड और चंबल के इलाकों में इन संगठनों ने अपनी जमीन तैयार की। मध्य भारत प्रांत में हिंदू महासभा को मिली शुरुआती सफलताओं के पीछे स्थानीय राजघरानों और रियासतों का भी एक तरह का वैचारिक समर्थन रहा था।

1952 में करपात्री महाराज ने उतारे थे उम्मीदवार

इसके अलावा, स्वामी करपात्री द्वारा स्थापित ‘रामराज्य परिषद’ ने भी 1952 के शुरुआती चुनावों में मध्य प्रदेश, विन्ध्य प्रदेश और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में अपने प्रत्याशी उतारे थे और रियासती इलाकों में उन्हें सफलता भी मिली थी। वहीं, भारतीय जनसंघ ने भी मालवा और मध्य भारत के कुछ चुनिंदा शहरी व ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी थी, हालांकि कांग्रेस का राजनीतिक प्रभाव उस दौर में व्यापक स्तर पर कायम था।

समय के साथ बदलता गया सियासी समीकरण

विश्लेषकों का मानना है कि दशकों के इस वैचारिक और राजनीतिक मंथन ने आगे चलकर मध्य प्रदेश की राजनीति को एक नया मोड़ दिया। नब्बे के दशक की शुरुआत में राज्य के राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव आया और चुनावी पटल पर नए आयाम जुड़े। समय के साथ प्रदेश के भीतर विकास, शासन, स्थानीय मुद्दों और वैचारिक बहसों के बीच राजनीति लगातार करवट लेती रही।

अब लिख रहा है विकास के नए आयाम

आज जब मध्य प्रदेश अपने गठन के इतने वर्ष पूरे कर चुका है, तो इसका राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास इस बात की गवाही देता है कि कैसे अलग-अलग संस्कृतियों और रियासतों को समेटकर बने इस भूभाग ने देश की मुख्यधारा की राजनीति में अपनी एक विशिष्ट और मजबूत पहचान बनाई है।

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