नई दिल्ली: आज से करीब 10 साल पहले की बात है। अगस्त 2016 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के गवर्नर के तौर पर अपना कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले रघुराम राजन ने एक महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने तब कहा था कि अगस्त-सितंबर 2013 में जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मॉनेटरी पॉलिसी को सख्त करने की अटकलों की वजह से बाजार में उतार-चढ़ाव था, तब विदेशी पैसा लाने के लिए अधिकारी कई आइडिया पर विचार कर रहे थे। हालांकि, ‘एक आइडिया ऐसा था जो मुझे पूरी तरह बेवकूफी भरा लगा। मुझे लगा कि ऐसा करना बहुत ही बुरा होगा।’ क्या अब एक बार फिर वह दौर लौट रहा है, जिसके बारे में रघुराम राजन ने चिंता जताई थी।रघुराम राजन को कौन सा आइडिया बेवकूफी भरा लगा
रघुराम राजन जिस आइडिया के बारे में बात कर रहे थे, वह आइडिया बैंकों के ‘फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक) डिपॉजिट’ या FCNR(B) डिपॉजिट के लिए स्वैप स्कीम थी। ये नॉन-रेजिडेंट इंडियंस यानी भारतीय मूल के लोगों और भारत के विदेशी नागरिकों के लिए तय समय वाले डिपॉजिट होते हैं। ऐसे डिपॉजिट खाताधारकों को अपनी विदेशी कमाई को रुपये में बदले बिना आसानी से बदली जा सकने वाली विदेशी मुद्राओं में रखने की सुविधा देते हैं।
कमाल कर गया आइडिया और भारत में निवेशकों का भरोढ़ा बढ़ा
इन डिपॉजिट के जरिए जुटाए गए विदेशी फंड पर बैंकों को 3.5% की सब्सिडी मिलती थी, जिससे वे विदेश में रहने वाले लोगों को आकर्षक ब्याज दरें दे पाते थे। यह सुविधा बहुत सफल रही, जिससे 26 अरब डॉलर का निवेश आया और रुपये व भारत में निवेशकों का भरोसा बहाल करने में मदद मिली।










































