पति से 1.5 करोड़ का समझौता और फिर 170 करोड़ का लालच! SC ने 26 साल पुरानी शादी की रद

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि पति-पत्नी ने आपसी सहमति से सभी विवादों का पूर्ण और अंतिम निपटारा कर लिया है, तो बाद में कोई भी पक्ष मनमाने ढंग से अपनी सहमति वापस नहीं ले सकता। अदालत ने माना कि समझौते के बाद मुकरना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।क्या था विवाद और समझौते की शर्तें?

यह मामला साल 2000 में हुई एक शादी से जुड़ा है। साल 2023 में पति द्वारा तलाक की याचिका दायर करने के बाद फैमिली कोर्ट ने इसे मध्यस्थता (Mediation) के लिए भेजा था। मध्यस्थता के दौरान दोनों पक्षों के बीच एक लिखित समझौता हुआ…पति की शर्तें: पति ने पत्नी को 1.5 करोड़ रुपये (दो किस्तों में), 14 लाख रुपये की कार और कुछ जेवर देने पर सहमति जताई।

पत्नी की शर्तें: इसके बदले में पत्नी जॉइंट बिजनेस अकाउंट से 2.5 करोड़ रुपये पति को ट्रांसफर करने पर राजी हुई।

विवाद की शुरुआत: समझौते के बाद आंशिक भुगतान भी हुआ और दोनों ने मिलकर तलाक की याचिका दाखिल की। लेकिन अंतिम सुनवाई (Second Motion) से ठीक पहले पत्नी ने अपनी सहमति वापस ले ली और पति पर घरेलू हिंसा का आरोप लगा दिया।

170 करोड़ के जेवरों का दावा और ‘आफ्टरथॉट’

पत्नी ने कोर्ट में एक नया दावा पेश किया कि लिखित समझौते के अलावा पति ने मौखिक रूप से 120 करोड़ के जेवर और 50 करोड़ के सोने के बिस्किट देने का वादा किया था, जिसे टैक्स बचाने के लिए कागजों पर नहीं दिखाया गया।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने पत्नी के इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि 23 साल की शादी के दौरान घरेलू हिंसा का कोई आरोप न होना और समझौते के बाद अचानक ऐसे दावे करना केवल एक ‘आफ्टरथॉट’ (बाद में गढ़ा गया विचार) है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और फैसला

अदालत ने कहा कि हालांकि आपसी सहमति से तलाक में डिक्री मिलने तक पीछे हटने का विकल्प होता है, लेकिन जब मध्यस्थता के जरिए हुआ समझौता अदालत स्वीकार कर लेती है, तो वह एक कानूनी बंधन बन जाता है।

न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान: समझौते से पीछे हटना मध्यस्थता व्यवस्था की बुनियाद पर चोट है।

अनुच्छेद 142 का उपयोग: सुप्रीम कोर्ट ने अपनी विशेष शक्तियों (Article 142) का इस्तेमाल करते हुए शादी को भंग कर दिया और तलाक की डिक्री जारी की।

लागत और निर्देश: अदालत ने पत्नी पर भारी जुर्माना लगाया, घरेलू हिंसा के मामलों को रद्द किया और पति को समझौते की बकाया राशि चुकाने का निर्देश दिया।

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