पर्युषण पर्व पर ९ दिनों तक निराहार व्रत रहने वाले ३ तपस्वी का किया गया सम्मान श्वेताम्बर जैन मंदिर में पारना (व्रत छोडऩा) कार्यक्रम का हुआ आयोजन

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नगर मुख्यालय में स्थित श्वेताम्बर जैन मंदिर में जैन धर्मावलंबियों के द्वारा २४ अगस्त से ३१ अगस्त तक
पर्युषण पर्व भक्तिभाव के साथ मनाया गया। पर्युषण पर्व के दौरान ९ दिवस तक दिन-रात का निराहार पारना (व्रत) रखने वाले ३ तपस्वीयों का २ अगस्त को व्रत छोडऩा (पारना) कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विनीत संचेती के निवास से प्रात: ९.३० बजे जैन धर्मालंबियों ने शोभायात्रा निकालकर श्वेताम्बर जैन मंदिर पहुंचे जहां भगवान महावीर की पूजा अर्चना कर पर्युषण पर्व में ९ दिवस तक निराहार व्रत रखने वाले तपस्वी १८ वर्षीय कु. गरिमा संचेती, गरिमा के दादा जी विजय संचेती, गरिमा की बड़ी मम्मी श्रीमती निशा संचेती का सम्मान किया गया जिसके बाद जैन स्थानक भवन में महाप्रसादी का वितरण किया गया। चर्चा में विनोद संचेती ने बताया कि २४ अगस्त से जैन धर्मालंबियों के द्वारा पर्युषण पर्व मनाया गया और पर्व के दौरान जैन धर्म में इंद्रियों को वश में करने के लिए उपवास रखा जाता है जो कि ९ दिनों का होता है जिसमें सिर्फ पानी का सेवन सूर्योदय के पहले एवं सूर्य अस्त के बाद किया जाता है और पर्यूषण पर्व के अवसर पर सभी जैन धर्मालंबी भक्तिभाव वातावरण में डूबे रहते है एवं पर्युषण पर्व पर कल्पसूत्र का वाचन होता है। श्री संचेती ने बताया कि पर्युषण पर्व के अवसर पर ८ दिनों तक विविध धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किये गये एवं पर्युषण पर्व पर ९ दिनों तक १८ वर्षीय कु. गरिमा संचेती, विनय संचेती एवं ८ दिनों तक श्रीमती निशा संचेती ने निराहार व्रत रखकर भगवान जी की आराधना की जिनका पारना (व्रत) छोडऩा कार्यक्रम का आयोजन २ सितंबर को आयोजित किया गया जिसमें प्रात: ९.३० बजे विनीत संचेती के निवास से शोभायात्रा निकाली गई जो श्वेताम्बर जैन मंदिर पहुंची जहां पूजा अर्चना कर पर्युषण पर्व पर निराहार व्रत रखने वाले तीन तपस्वी का सम्मान किया गया। श्री संचेती ने बताया कि पर्युषण पर्व के अंतिम दिन क्षमावान पर्व मनाते है इस अवसर पर संसार के ८४ लाख योनि में जितने भी जीव-जंतु है उनसे क्षमा याचना करते है कि यदि भविष्य में हमसे जो भी गलती हुई होगी, दिल दुखाया होगा उन सभी से क्षमा मांगते है साथ ही यह भी बताया कि यह पर्व हमारी आत्मा को निर्मल बनाने वाला पर्व है और पर्युषण पर्व में धीरे-धीरे हमारी आत्मा निर्मल होती जाती है।

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