नरेंद्र मोदी सरकार को 12 साल के शासनकाल में संसद में पहली बार इसी साल अप्रैल में मात खानी पड़ी, जब परिसीमन विधेयक लोकसभा में 54 वोटों से गिर गया। संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए और सरकार इससे बहुत पीछे थी। कुछ जानकारों को लगता है कि मोदी सरकार ने अति आत्मविश्वास में ऐसा कदम उठाया। चूंकि पिछले कार्यकाल में उसने राज्यसभा में बिना बहुमत ही धारा-370 और तीन तलाक सरीखे विधेयक पारित करा लिए थे। हालांकि मुझे लगता है कि सरकार का कदम सुनियोजित था।
चुनाव पर असर: अगर पिछली बार की तरह जुगाड़ से संविधान संशोधन विधेयक पारित हो जाता, तो सरकार और BJP खुद को महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की चैंपियन बताती। हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम बताते हैं कि वैसा न हो पाने पर भी BJP विपक्ष को महिला आरक्षण विरोधी के रूप में पेश करने में सफल हो गई। बेशक पहले ही पारित हो चुके महिला आरक्षण विधेयक से परिसीमन विधेयक का सीधा संबंध बहस का विषय है, पर उससे महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने में देरी तो हो ही सकती है।










































